दुर्जन
दुर्जनः परिहर्तव्यः मुद्रण ई-मेल
दुर्जनः परिहर्तव्यः विध्ययालंकृतोऽपि सन् ।
मणिना भूषितः सर्पः किमसो न भयंकरः ॥

दुर्जन विद्या से अलंकृत हो फ़िर भी उसका त्याग करना चाहिए । मणि से भूषित सर्प क्या भयंकर नही होता?

 
उपकारोऽपि नीचानाम मुद्रण ई-मेल
उपकारोऽपि नीचानामपकारो हि जायते ।
पयः पानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम् ॥

नीच मानव पर किया उपकार भी अपकार बनता है । सर्प को पिलाया दूध केवल विष ही बढाता है ।

 
खलो न साधुतां याति मुद्रण ई-मेल
खलो न साधुतां याति सदिः संबोधितोपि सन् ।
सरित्पूरप्रपूर्णोऽपि क्षारो न मधुरायते ॥

अच्छे मानवों से संबोधित हुआ हो, फ़िर भी दुष्ट मानव साधु नहीं बनता । नदियों के पूर से भरपूर होने के बावजूद सागर मधुर नहीं बनता ।

 
सर्पदुर्जनयो र्मध्ये मुद्रण ई-मेल
सर्पदुर्जनयो र्मध्ये वरं सर्पो न दुर्जनः ।
सर्पो दशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे ॥

सर्प और दुर्जन इन दोनों में दुर्जन से साँप अच्छा क्यों कि सर्प तो समप आने पर हि काटता है, लेकिन दुर्जन तो हर कदम पर काटता है ।

 
दुर्जन प्रथमं वन्दे मुद्रण ई-मेल
दुर्जन प्रथमं वन्दे सज्जनं तदनन्तरम् ।
मुखप्रक्षालनात्पूर्व गुदप्रक्षालनं यथा ॥

मैं दुर्जन को प्रथम वंदन करता हूँ, और बाद में सज्जन को । मुख धोने से पहले गुद्प्रक्षालन करना चाहिए ।

 
मूर्खशिष्योपदेशेन मुद्रण ई-मेल
मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।
असतां संप्रयोगेन पण्डितोप्यवसीदति ॥

मूर्ख शिष्य को उपदेश देने से, दुष्ट स्त्री का भरण पोषण करने से, और दुष्टके संयोग से पंडित भी नष्ट होता है ।

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।

असतां संप्रयोगेन पण्डितोप्यवसीदति ॥

 
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