दुर्जन
यथा परोपकारेषु नित्यं मुद्रण ई-मेल
यथा परोपकारेषु नित्यं जागर्ति सज्जनः ।
तथा परापकारेषु जागर्ति सततं खलः ॥

जैसे सज्जन परोपकार करने में नित्य जाग्रत होता है, वैसे दुर्जन अपकार करने में हमेशा जाग्रत होता है ।

 
तक्षकस्य विषं दन्ते मुद्रण ई-मेल
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाश्र्च मस्तके ।
वृश्र्चिकस्य विषं पृच्छे सर्वांगे दुर्जनस्य तत् ॥

सर्प का झहर दांत में, मक्खी का मस्तक में और बिच्छु का पूंछ में होता है । लेकिन दुर्जनका झहर तो उसके पूरे अंग में होता है ।

 
दुर्जनः स्वस्वभावेन मुद्रण ई-मेल
दुर्जनः स्वस्वभावेन परकार्य विनश्यति ।
नोदरतृप्तिमायाति मुषकः वस्त्रभक्षकः ॥

दुर्जन अपने स्वभाव से हि दूसरे के कर्य को हानि पहुँचाता है । वस्त्रभक्षक चूहा उदर तृप्ति के लिए वस्त्र नहीं काटता !

 
खलानां कण्टकानां च मुद्रण ई-मेल
खलानां कण्टकानां च द्विविधैव प्रतिक्रिया ।
उपानन्मुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम् ॥

दुष्ट मानव और कंटक को दूर करने के दो हि उपाय है, या तो जूते से मुख तोड दो, या तो दूर से हि भगा दो ।

 
कापुरुषः कुकुरश्र्च मुद्रण ई-मेल
कापुरुषः कुकुरश्र्च भोजनैकपरायणः ।
लालितः पार्श्र्चमायाति वारितः त च गच्छति ॥

कापुरुष और कुत्ता दोनों भोजन परायण होते है । प्यार करने से पास आते हैं और दूर करनेसे जाते नहीं ।

 
दुर्जनस्य विशिष्टत्वं मुद्रण ई-मेल
दुर्जनस्य विशिष्टत्वं परोपद्रवकारणम् ।
व्याघ्रस्य चोपवासेन पारणं पशुमारणम् ॥

दुर्जन कोई विशेष कार्य करे तो दूसरे के उपद्रव का कारण बनता है । शेर अगर उपवास करे तो उसके दूसरे दिन का खाना पशु की हत्या होती है ।

 
दुर्जनः प्रियवादी च मुद्रण ई-मेल
दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्र्चासकारणम् ।
मधु तिष्ठति जिह्याग्रे हदये तु हलाहलम् ॥

दुर्जन प्रियबोलनेवाला हो फिर भी विश्वास करने योग्य नहीं होता क्यों कि चाहे उसकी जबान पर भले हि मध हो, पर हृदय में तो हलाहल झहर हि होता है ।

 
दुर्जनो दोषमादत्ते मुद्रण ई-मेल
दुर्जनो दोषमादत्ते दुर्गन्धमिव सूकरः ।
सज्जनश्र्च गुणग्राही हंसः क्षीरमिवाम्भसः ॥

सूअर जैसे दुर्गंध को वैसे दुर्जन दोष को ग्रहण करता है । और हंस जैसे पानी में से दूध को वैसे सज्जन गुणको ग्रहण करता है ।

 
न विना परवादेन मुद्रण ई-मेल
न विना परवादेन रमते दुर्जनो जनः ।
काकः सर्वरसान् भुंक्ते विनाऽमध्यं न तृप्यति ॥

लोगों की निंदा किये बिना दुर्जनों को आनंद नहीं आता । कौए को सब रस भुगतने के बावजुद गंदगी बिना तृप्ति नहीं होती ।

 
स्पृशन्नपि गजो हन्ति मुद्रण ई-मेल
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः ।
हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन् अपि दुर्जनः ॥

स्पर्श करने से हाथी, सुंघने से सर्प, और हसते हसते राजा (अन्य को) मार देता है । वैसे ही मान देनेके बावजुद दुर्जन मानव को मार देता है ।

 
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