दुर्जन
मृगमीनसज्जनानां मुद्रण ई-मेल
मृगमीनसज्जनानां तृणजलसंतोषवृत्तीनाम् ।
लुब्धकधीवरपिशुनाः निष्कारणमेव वैरिणो जगति ॥

घास, पानी ओर संतोष से जीनेवाले हिरण, मछलियाँ सज्जन के अनुक्रम से पारधी, मच्छीमार ओर दुष्ट निष्कारण बैरी होते हैं ।

 
अहो दुर्जनसंसर्गात् मुद्रण ई-मेल
अहो दुर्जनसंसर्गात् मानहानिः पदे पदे ।
पावको लोहसंगेन मुद्ररैरभिहन्यते ॥

दुर्जन के संसर्ग से कदम कदम पर हानि होती है । लोहे के संसर्ग से अग्नि को भी हथौडे से पीटना पडता है ।

 
अहो खलुभुंजगस्य मुद्रण ई-मेल
अहो खलुभुंजगस्य विपरीतो वधक्रमः ।
कर्णे लगति एकस्य प्राणैरन्यो विमुच्यते ॥

अरे ! दुष्ट मानव रुपी सर्प की वध करने की रीत हि अलग है; यह तो एक के कान को स्पर्श करें ओर जान दूसरे की जाए (याने कि एक के कान में कुछ कहे ओर नुकसान दुसरे को हो) !

 
अतिरमणीये कव्येऽपि मुद्रण ई-मेल
अतिरमणीये कव्येऽपि पिशुनो दूषणमन्वेषयति ।
अतिरमणीये वपुषि व्रणमिव मक्षिकानिकरः ॥

जैसे सुंदर शरीर में भी मक्खीयों का समूह व्रण को ढूँढता है, वैसे रमणीय काव्य में भी दुष्ट दोष ढूँढता है ।

 
कृतवैरे न विश्र्वासः मुद्रण ई-मेल
कृतवैरे न विश्र्वासः कार्यस्त्विह सुहध्यति ।
छन्नं संतिष्ठते वैरं गूठोऽग्रिरिव दारुषु ॥

जिसके साथ बैर हुआ हो एसे सुह्र्द पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए । जैसे लकडे में अग्नि छूपा है वैसे उनमें बैर छूपा होता है ।

 
न दुर्जनः सज्जनतामुपैति मुद्रण ई-मेल
न दुर्जनः सज्जनतामुपैति
बहु प्रकारैरपि सेव्यमानः ।
अत्यंतसिक्तः पयसा धृतेन
न निम्बवृक्षः मधुतामुपैति ॥

विविध प्रकार से सेवा करने के बावजुद दुर्जन सज्जन नहीं बनता । दूध ओर घी में अत्यंत डूबोया हुआ निंबवृक्ष मधुर नहीं बनता ।

 
तुष्यन्ति भोजनैर्विप्राः मुद्रण ई-मेल
तुष्यन्ति भोजनैर्विप्राः मयूरा धनगर्जितैः ।
साधवः परकल्याणैः खलाः परविपत्तिभिः ॥

ब्राह्मण भोजन से, मोर मेघगर्जना से, सज्जन परकल्याण से ओर दुष्ट परविपत्ति से खुश होता है ।

 
मृगमदकर्पूरागरुचन्दन मुद्रण ई-मेल
मृगमदकर्पूरागरुचन्दनगन्धाधिवासितो लशुनः ।
न त्यजति गंधमशुभं प्रकृतिमिव सहोत्थितां नीचः ॥

कस्तूरी, कपूर, अगरु और सुवास से सुवासित किया हुआ लसून अपनी दुर्गंध नहीं छोडता । वैसे हि दुष्ट अपनी जन्मजात नीच व्रृत्तिओं का त्याग नहीं करता ।

 
यथा गजपतिः श्रान्तः मुद्रण ई-मेल
यथा गजपतिः श्रान्तः छायार्थी वृक्षमाश्रितः ।
विश्रम्य तं द्रुमं हन्ति तथा नीचः स्वमाश्रयम् ॥

जैसे थका हुआ हाथी छांव लेने वृक्ष का आश्रय लेता है, और विश्राम के बाद वृक्षका नाश करता है वैसे नीच मानव खुदको आश्रय देनेवाले का नाश करता है ।

 
पाषाणो भिध्यते टंके मुद्रण ई-मेल
पाषाणो भिध्यते टंके वज्रः वज्रेण भिध्यते ।
सर्पोऽपि भिध्यते मन्त्रै र्दुष्टात्मा नैव भिध्यते ॥

पाषाण टंक से, वज्र वज्रसे, साप मंत्रसे भेदा जाता है, लेकिन दुष्ट मानव किसी से भी नहीं भेदा जाता ।

 
<< प्रारंभ करना < पीछे 1 2 3 4 5 6 अगला > अंत >>

पृष्ठ 3 का 6

[+]
  • Increase font size
  • Default font size
  • Decrease font size
 Type in