उद्यम
षड्दोषा पुरुषेणेह मुद्रण ई-मेल
षड्दोषा पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधं आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥

उन्नति की कामना करनेवाले ने निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य, और दीर्घसूत्रता (काम टालने की वृत्ति) का त्याग करना चाहिए ।

 
उत्साहसंपन्नमदीर्घसूत्रम् मुद्रण ई-मेल
उत्साहसंपन्नमदीर्घसूत्रम्
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् ।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च
लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः ॥

उत्साहपूर्ण, काम पीछे न टालनेवाला (अदीर्घसूत्री), पद्धति से काम करनेवाला, निर्व्यसनी, शूर, कृतज्ञ, और दृढ व स्वच्छ हृदयवाले के यहाँ लक्ष्मी स्वयं निवास करने आती है ।

 
तृणादपि लघुस्तूलः मुद्रण ई-मेल
तृणादपि लघुस्तूलः तूलादपि च याचकः ।
वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं प्राथयेदिति ॥

तिन्के से हल्का रु है, और रु से भी हल्का याचक है । पर, याचक को वायु क्यों नहीं खींच जाता ? (इस लिये कि उसे डर है) कहीं मुज से भी माग लेगा तो !

 
आशा नाम मनुष्याणां मुद्रण ई-मेल
आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यशृंखला ।
यया बद्धाःप्रधावन्ति मुक्तास्तिष्टन्ति पंगुवत् ॥

आशा मनुष्यों की आश्चर्यकारक बेडी है, जिससे बद्ध व्यक्ति दौडने लगता है और मुक्त व्यक्ति पंगुवत् स्थिर हो जाता है !

 
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते मुद्रण ई-मेल
गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते पितृवंशो निरर्थकः ।
वासुदेवं नमस्यन्ति वसुदेवं न वै जनाः ॥

गुणों की ही सर्वत्र पूजा होती है, ना कि पितृवंश की ! लोग वासुदेव की पूजा करते हैं, न कि वसुदेव की ।

 
आशाया ये दासास्ते मुद्रण ई-मेल
आशाया ये दासास्ते दासाः सन्ति सर्वलोकस्य ।
आशा येषां दासी तेषां दासायते लोकः ॥

जो आशा के दास है उन्हें सब का दास बनना पडता है; (पर) आशा जिनकी दासी है उसके सभी दास बनते हैं ।

 
आलस्यं हि मनुष्याणां मुद्रण ई-मेल
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्शो महारिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ॥

आलस्य इन्सान के शरीर का सबसे बडा शत्रु है । उद्योग जैसा साथी नहीं क्यों कि उद्योग करनेवाले का नाश नहीं होता ।

 
उद्यमः साहसं धैर्यं मुद्रण ई-मेल
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत् ॥

जहाँ उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम ये छे (गुण) होते हैं वहाँ तकदीर मदत करती है ।

 
श्रमेण लभ्यं सकलं मुद्रण ई-मेल
श्रमेण लभ्यं सकलं न श्रमेण विना क्वचित् ।
सरलाङ्गुलि संघर्षात् न निर्याति घनं घृतम् ॥

श्रम से सब मिलता है, श्रम बिना कुछ नहि । सीधी उँगली से घी निकलता नहि ।

 
शुभकार्ये विलम्बः स्यात् मुद्रण ई-मेल
शुभकार्ये विलम्बः स्यात् नाशुभे तु कदाचन ।
विलम्बो जायते गेहनिर्माणे न तु पातने ॥

शुभ कार्य में विलंब होता है, (पर) अशुभ कार्य में कभी विलंब नहि होता । घर बांधने में देर लगती है, पर गिराने में नहि ।

 
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