दान
दानतो वैरिणोऽपि स्यु मुद्रण ई-मेल
दानतो वैरिणोऽपि स्यु र्मित्राण्येव न संशयः ।
दाने सर्वमिदं विश्वं प्रतितिष्ठति सर्वदा ॥

दान से शत्रु भी मित्र बन जाते हैं, यह निर्विवाद है । समस्त विश्व हमेशा दान पर ही खडा रहता है ।

 
काले ददाति योऽपात्रे मुद्रण ई-मेल
काले ददाति योऽपात्रे वितीर्णं तस्य नश्यति ।
निक्षिप्तमूषरे बीजं किं कदाचिदवाप्यते ॥

समय आने पर जो कुपात्र को देता है, उसका दिया हुआ नष्ट होता है । बंजर जमीन पे बोया हुआ बीज क्या कभी वापस मिलता है (उगता है) ?

 
ध्यानेन शोभते योगी मुद्रण ई-मेल
ध्यानेन शोभते योगी संयमेन तपोधनः ।
सत्येन वचसा राजा गृही दानेन चारुणा ॥

योगी ध्यान से, तपस्वी संयम से, राजा सत्यवचन से और गृहस्थी चारु (सम्यक्) ज्ञान से शोभित होते हैं ।

 
शुध्यति भस्मना कांस्यं मुद्रण ई-मेल
शुध्यति भस्मना कांस्यं नारी शीलेन शुध्यति ।
शुध्यति तपसा साधुः गृही दानेन शुध्यति ॥

कांसे का पात्र भस्म से, नारी शील से, साधु तप से, और गृहस्थी दान से शुद्ध होता है ।

 
कुभोजने दिनं नष्टं मुद्रण ई-मेल
कुभोजने दिनं नष्टं कुनार्या यौवनं हतम् ।
कुपुत्रेण कुलं नष्टं धनं नष्टं न दीयते ॥

कुभोजन से दिन बिगडता है; कुनारी से यौवन खत्म होता है; कुपुत्र से कुल नष्ट होता है; और न देने से धन-नाश होता है ।

 
दानं च निजहस्तेन मुद्रण ई-मेल
दानं च निजहस्तेन मातृहस्तेन भोजनम् ।
तिलकं स्वसृहस्तेन परहस्तेन मर्दनम् ॥

दान निजहाथों से, भोजन माँ के हाथों से, तिलक बहन के हाथ से और मर्दन पराये हाथों से कराना चाहिए ।

 
तुरगशतसहस्रं गोगजानां मुद्रण ई-मेल
तुरगशतसहस्रं गोगजानां च लक्षं
कनकरजत पात्रं मेदिनी सागरान्ता ।
सुरयुवति समानं कोटिकन्याप्रदानं
न हि भवति समानं चान्नदानात्प्रधानम् ॥

सहस्र घोडे, लाखों गाय और हाथी, सोने-चांदी के पात्र, आसागर पर्यंत पृथ्वी, अप्सरा जैसी करोडों कन्याओं का दान, ये कुछ भी अन्नदान जैसा श्रेष्ठ नहीं ।

 
दानेन भूतानि वशीभवन्ति मुद्रण ई-मेल
दानेन भूतानि वशीभवन्ति
दानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम् ।
परोऽपि बन्धुत्वमुपैति दानैः
दानं हि सर्वव्यसनानि हन्ति ॥

दान लोगों को वश करता है; दान से वैर भी नाश होता है; दान से पराया भी अपना बन जाता है । दान सब व्यसन, दुःखादि दूर करता है ।

 
दातव्यं भोक्तव्यं सति मुद्रण ई-मेल
दातव्यं भोक्तव्यं सति विभवे सञ्चयो न कर्तव्यः ।
पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये ॥

जब धन हो तब दे देना चाहिए, और न कि उसका संचय करना । देखो ! मधुमक्खी ने इकट्ठा किया हुआ धन दूसरा ले जाता है ।

 
<< प्रारंभ करना < पीछे 1 2 3 4 5 6 7 अगला > अंत >>

पृष्ठ 7 का 7

[+]
  • Increase font size
  • Default font size
  • Decrease font size
 Type in