दान
दानं ख्यातिकरं सदा मुद्रण ई-मेल
दानं ख्यातिकरं सदा हितकरं संसार सौख्याकरं
नृणां प्रीतिकरं गुणाकरकरं लक्ष्मीकरं किङ्करम् ।
स्वर्गावासकरं गतिक्षयकरं निर्वाणसम्पत्करम्
वर्णायु र्बलबुद्धि वर्ध्दनकरं दानं प्रदेयं बुधैः ॥

दान ख्याति बढानेवाला, सदा हित करनेवाला, संसार सुखी करनेवाला, प्रीतिकर, गुणों का लानेवाला, लक्ष्मीदायक, सेवकरुप, स्वर्गदाता, गति क्षय करनेवाला, मोक्षरुप संपत्त देनेवाला, आयुष्य, बल और बुद्धिदाता है । (इस लिए) बुद्धिमान् लोगों ने दान करना चाहिए ।

 
देयं भेषजमार्तस्य मुद्रण ई-मेल
देयं भेषजमार्तस्य परिश्रान्तस्य चासनम् ।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम् ॥

पीडित को औषध, थके हुए को आसन, प्यासे को पानी और भूखे को भोजन देना चाहिए ।

 
गोदुग्धं वाटिकापुष्पं मुद्रण ई-मेल
गोदुग्धं वाटिकापुष्पं विद्या कूपोदकं धनम् ।
दानाद्विवर्धते नित्यमदानाच्च विनश्यति ॥

दान करने से (हर प्रकार की समृद्धि जैसे..) गाय का दूध, बाग के फूल, विद्या, कूए का पानी और धन (इत्यादि) नित्य बढते रहते हैं, पर अदान से ये सब नष्ट होते हैं ।

 
दानं वाचः तथा बुद्धेः मुद्रण ई-मेल
दानं वाचः तथा बुद्धेः वित्तस्य विविधस्य च ।
शरीरस्य च कुत्रापि केचिदिच्छन्ति पण्डिताः ॥

वाणी का, बुद्धि का, विविध प्रकार के धन का, और कहीं तो शरीर का भी दान करने पंडित (विद्वान/सत्पुरुष) इच्छा करते हैं (तैयार रहते हैं) ।

 
अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं मुद्रण ई-मेल
अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥

खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।

 
पात्रेभ्यः दीयते नित्यमनपेक्ष्य मुद्रण ई-मेल
पात्रेभ्यः दीयते नित्यमनपेक्ष्य प्रयोजनम् ।
केवलं त्यागबुध्दया यद् धर्मदानं तदुच्यते ॥

किसी प्रकार के प्रयोजन बिना, जो केवल त्यागबुद्धि से दिया जाता है, वही धर्मदान कहलाता है ।

 
अपात्रेभ्यः तु दत्तानि मुद्रण ई-मेल
अपात्रेभ्यः तु दत्तानि दानानि सुबहून्यपि ।
वृथा भवन्ति राजेन्द्र भस्मन्याज्याहुति र्यथा ॥

हे राजेन्द्र ! जैसे (यज्ञकुंड में बची) भस्म पर घी की आहुति देना निरर्थक है, वैसे ही अपात्र को दिया हुआ बहुत सारा दान व्यर्थ है ।

 
भवन्ति नरकाः पापात् मुद्रण ई-मेल
भवन्ति नरकाः पापात् पापं दारिद्य सम्भवम् ।
दारिद्यमप्रदानेन तस्मात् दानपरो भव ॥

पाप से नरक उत्पन्न होता है; पाप दारिद्र्य में से, और दारिद्र्य अप्रदान में से निर्माण होता है । अर्थात् तू दान के लिए तत्पर बन ।

 
यद्ददाति यदश्नाति तदेव मुद्रण ई-मेल
यद्ददाति यदश्नाति तदेव धनिनो धनम् ।
अन्ये मृतस्य क्रीडन्ति दारैरपि धनैरपि ॥

धनिक का सच्चा धन तो वही है जो वह (दान) देता है और जो (स्वयं) भोगता है । अन्यथा मरणांतर तो, उसकी स्त्री और धन का उपभोग बाकी के लोग ही करते हैं ।

 
दानेन प्राप्यते स्वर्गो मुद्रण ई-मेल
दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः ॥

दान से स्वर्ग प्राप्त होता है, दान से ही सुख मिलता है । इस लोक और परलोक में इन्सान दान से ही पूज्य बनता है ।

 
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