दान
पिपीलिकार्जितं धान्यं मुद्रण ई-मेल
पिपीलिकार्जितं धान्यं मक्षिकासंचितं मधु ।
लुब्धेनोपार्जितं द्रव्यं समूलं च विनश्यति ॥

चींटी ने इकट्ठा किया हुआ धान्य, मधुमक्खी ने इकट्ठा किया हुआ मधु, लोभी ने इकट्ठा किया हुआ धन, इन सभी का मूल से ही नाश होता है ।

 
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च मुद्रण ई-मेल
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

जो दान बिना सत्कार, तिरष्कारपूर्वक, अयोग्य देश-काल में या कुपात्र को दिया जाता है, वह तामस दान कहलाता है ।

 
यत्तु प्रत्युपकारार्थं मुद्रण ई-मेल
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

जो दान क्लेश से, प्रत्युपकार की भावना से, या फल मिलने की अपेक्षा से दिया जाता है, वह राजस दान कहा गया है ।

 
दातव्यमिति यद्दानं मुद्रण ई-मेल
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

"दान देना कर्तव्य है" ऐसी भावना से जो दान देश, काल, और योग्य पात्र देखकर, प्रत्युपकार की भावना रखे बिगैर दिया जाता है वह सात्त्विक दान कहा गया है ।

 
आत्मार्थं जीवलोकेस्मिन् मुद्रण ई-मेल
आत्मार्थं जीवलोकेस्मिन् को न जीवति मानवः ।
परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति ॥

इस दुनिया में अपने लिए कौन मानव नहीं जीता (सब जीते हैं) ? लेकिन परोपकार के लिए जीए उसे जीया कहते हैं ।

 
यस्मिन् जीवति जीवन्ति मुद्रण ई-मेल
यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवति ।
काकोऽपि किं न कुरुते चंच्वा स्वोदरपूरणम् ॥

जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता ? ?

 
यस्य जीवन्ति धर्मेण मुद्रण ई-मेल
यस्य जीवन्ति धर्मेण पुत्रा मित्राणि बान्धवाः ।
सफलं जीवितं तस्य नात्मार्थे को हि जीवति ॥

जिसके सत्कर्म से पुत्र, मित्र और बंधु जीते हैं उसका जीवन सफल है अन्यथा अपने लिए कौन नहीं जीता "सब जीते हैं" ।

 
दानोपभोगरहिता दिवसा मुद्रण ई-मेल
दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै ।
स लोहकारभस्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥

जिसके दिन दान का उपभोग लिये बिना पसार होता है, वह साँस लेते हुए भी लोहार के धमन की भाँति जीवंत नहीं है ।

 
वाणी सरस्वती यस्य मुद्रण ई-मेल
वाणी सरस्वती यस्य भार्या पुत्रवती सती ।
लक्ष्मीः दानवती यस्य सफलं तस्य जीवितम् ॥

जिसकी वाणी रसवती हो, पत्नी पुत्रवती हो, और लक्ष्मी दानवती हो उसका जीवन सफल है ।

 
दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो मुद्रण ई-मेल
दानं भोगो नाशस्तिस्त्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य ।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥

दान, भोग, व नाश - ये वित्त की तीन गतियाँ हैं । जो देता नहीं है, और भुगतता भी नहीं है, उसके वित्त की तीसरी गति अर्थात् नाश होता है ।

 
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