संभोजनं संकथनं मुद्रण
संभोजनं संकथनं संप्रीतिश्च परस्परम् ।
ज्ञातिभिः सह कार्याणि न विरोधः कदाचन ॥

ज्ञातिजनों के साथ परस्पर संभोजन, वार्तालाप, प्रीति रखने चाहिए । विरोध (कलह) कभी नहि करना चाहिए ।