तृणं चाहं वरं मन्ये मुद्रण
तृणं चाहं वरं मन्ये नरादनुपकारिणः ।
घासो भूत्वा पशून्पाति भीरुन् पाति रणांगणे ॥

जो तृण बनकर पशु का रक्षण करता है, और रणांगण में दूसरों को बचाता है, उन तृण के तुकडों को मैं, अपकारी मानव से ज़ादा श्रेष्ठ समज़ता हूँ ।