धनानि जीवितं चैव मुद्रण
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
तन्निमित्तो वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥

समज़दार इन्सान ने धन और जीवन को दूसरे के लिए उपयोग करना चाहिए । विनाश निश्चित है, उस निमित्त से दूसरे के लिए त्याग करना उचित है ।