परोपकार
धनानि जीवितं चैव मुद्रण ई-मेल
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
तन्निमित्तो वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥

समज़दार इन्सान ने धन और जीवन को दूसरे के लिए उपयोग करना चाहिए । विनाश निश्चित है, उस निमित्त से दूसरे के लिए त्याग करना उचित है ।

 
रत्नाकरः किं कुरुते स्वरत्नैः मुद्रण ई-मेल
रत्नाकरः किं कुरुते स्वरत्नैः
विन्ध्याचलः किं करिभिः करोति ।
श्रीखण्डखण्डै र्मलयाचलः किं
परोपकाराय सतां विभूतयः ॥

समंदर को अपने रत्नों का क्या उपयोग ? विंध्याचल को उसके हाथीयों का क्या काम ? मलयाचल पर्वत को चंदन का क्या उपयोग ? सत्पुरुषों का जन्म परोपकार के लिए हि होता है ।

 
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः मुद्रण ई-मेल
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विभृतयः ॥

नदियाँ अपना पानी खुद नहीं पीती, वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते, बादल (खुद ने उगाया हुआ) अनाज खुद नहीं खाते । सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए हि होता है ।

 
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