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भाग्य-भाग्यं फ़लति सर्वत्र मुद्रण ई-मेल

भाग्य 
भाग्यं फ़लति सर्वत्र न विद्या न च पौरुषम् ।
भाग्य हि फ़ल देता है, विद्या या पौरुष नहीं ।

 
भाग्य-चराति चरतो भगः मुद्रण ई-मेल

भाग्य 
चराति चरतो भगः ।
चलेनेवाले का भाग्य चलता है ।

 
भवितव्य-सहायास्तादृशा एव मुद्रण ई-मेल

भवितव्य
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ।
जैसी भवितव्यता हो एसे हि सहायक मिल जाते हैं ।

 
भवितव्य-यदभावि न तदभावी मुद्रण ई-मेल

भवितव्य
यदभावि न तदभावी भावि चेन्न तदन्यथा ।
जो नहीं होना है वो नहीं होगा, जो होना है उसे कोई टाल नहीं सकता ।

 
भय-भये सर्वे हि बिभ्यति मुद्रण ई-मेल

भय
भये सर्वे हि बिभ्यति ।
भय का कारण उपस्थिति हो तब सब भयभीत होते हैं ।

 
भय-द्वितीयाद्वै भयं मुद्रण ई-मेल

भय
द्वितीयाद्वै भयं भवति ।
दूसरा हो वहाँ भय उत्पन्न होता है ।

 
बन्धु-न बन्धुमध्ये मुद्रण ई-मेल

बन्धु
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ।
बन्धुओं के बीच धनहीन जीवन अच्छा नहीं ।

 
बलवान-अहो दुरन्ता मुद्रण ई-मेल

बलवान
अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता ।
बलवान के साथ विरोध करनेका परिणाम दुःखदायी होता है ।

 
बलवान-बलवन्तो हि अनियमाः मुद्रण ई-मेल

बलवान
बलवन्तो हि अनियमाः नियमा दुर्बलीयसाम् ।
बलवान को कोई नियम नहीं होते, नियम तो दुर्बल को होते हैं ।

 
प्रयोजन-प्रयोजनमनुद्रिश्य मुद्रण ई-मेल

प्रयोजन     
प्रयोजनमनुद्रिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते ।
मूढ मानव भी बिना प्रयोजन कोई काम नहीं करता ।

 
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