सूक्तियाँ
सुभाषित-पृथिव्यां त्रीणि मुद्रण ई-मेल

सुभाषित
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
इस पृथ्वी पर तीन रत्न हैं; जल, अन्न और सुभाषित ।

 
साक्षर-साक्षरा विपरीताश्र्चेत् मुद्रण ई-मेल

साक्षर
साक्षरा विपरीताश्र्चेत् राक्षसा एव केवलम् ।
साक्षर अगर विपरीत बने तो राक्षस बनता है ।

 
शील-कुरूपता शीलतया मुद्रण ई-मेल

शील
कुरूपता शीलतया विराजते ।
कुरूप व्यक्ति भी शीलवान हो तो सुंदर लगती है ।

 
शील-कुलं शीलेन रक्ष्यते मुद्रण ई-मेल

शील
कुलं शीलेन रक्ष्यते ।
शील से कुल की रक्षा होती है ।

 
शील-शीलं भूषयते कुलम् मुद्रण ई-मेल

शील
शीलं भूषयते कुलम् ।
शील कुल को विभूषित करता है ।

 
वक्ता-किं करिष्यन्ति वक्तारो मुद्रण ई-मेल

वक्ता 
किं करिष्यन्ति वक्तारो श्रोता यत्र न बुध्द्यते ।
जहाँ श्रोता समजदार नहीं है वहाँ वक्ता (भाषण देकर) भी क्या करेगा ?

 
वक्ता-अप्रियस्य च पथ्यस्य मुद्रण ई-मेल

वक्ता 
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ।
अप्रिय हितकर वचन बोलनेवाला और सुननेवाला दुर्लभ है ।

 
मित्र-मृजया रक्ष्यते रूपम् मुद्रण ई-मेल

मित्र
मृजया रक्ष्यते रूपम् ।
शृंगार से रुप की रक्षा होती है ।

 
मित्र-सर्वे मित्राणि समृध्दिकाले मुद्रण ई-मेल

मित्र
सर्वे मित्राणि समृध्दिकाले ।
समृद्धि काल में सब मित्र बनते हैं ।

 
मित्र-आपदि मित्र परीक्षा मुद्रण ई-मेल

मित्र
आपदि मित्र परीक्षा ।
आपत्ति में मित्र की परीक्षा होती है ।

 
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