सूक्तियाँ
लोभ-लोभं हित्वा मुद्रण ई-मेल

लोभ  
लोभं हित्वा सुखी भलेत् ।
लोभका त्याग करने से मानवी सुखी होता है ।

 
लोभ-अन्तो नास्ति पिपासायाः मुद्रण ई-मेल

लोभ  
अन्तो नास्ति पिपासायाः ।
तृष्णा का अन्त नहीं है ।

 
लालन-लालने बहवो दोषाः मुद्रण ई-मेल

लालन
लालने बहवो दोषाः ताडने बहवो गुणाः ।
लालन में बहुत दोष हैं, मार मारनेमे बहुत गुण हैं ।

 
रूप-रूपेण किं गुणपराक्रमवर्जितेन मुद्रण ई-मेल

रूप
रूपेण किं गुणपराक्रमवर्जितेन ।
जिस रूप में गुण या पराक्रम न हो उस रूप का क्या उपयोग ?

 
रूप-मृजया रक्ष्यते रूपम् मुद्रण ई-मेल

रूप
मृजया रक्ष्यते रूपम् ।
स्वच्छता से रूप की रक्षा होती है ।

 
रूप-कुरूपता शीलयुता मुद्रण ई-मेल

रूप
कुरूपता शीलयुता विराजते ।
कुरुप व्यक्ति भी शीलवान हो तो शोभारुप बनती है ।

 
रूप-तद् रूपं यत्र गुणाः मुद्रण ई-मेल

रूप
तद् रूपं यत्र गुणाः ।
जिस रुप में गुण है वही उत्तम रुप है ।

 
रूचि-भिन्नरूचि र्हि लोकः मुद्रण ई-मेल

रूचि
भिन्नरूचि र्हि लोकः ।
मानव अलग अलग रूचि के होते हैं ।

 
रिक्त-रिक्तः सर्वो भवति मुद्रण ई-मेल

रिक्त
रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय ।
चीज खाली होने से हल्की बन जाती है; गौरव तो पूर्णता से हि मलता है ।

 
राजा-लोकरझ्जनमेवात्र मुद्रण ई-मेल

राजा 
लोकरझ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः ।
प्रजा को सुखी रखना यही राजा का सनातन धर्म है ।

 
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