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वाणी-वाक्शल्यस्तु न मुद्रण ई-मेल

वाणी
वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तु शक्यो ह्रदिशयो हि सः ।
दुर्वचन रुपी बाण को बाहर नहीं निकाल सकते क्यों कि वह ह्रदय में घुस गया होता है ।

 
वाणी-वाण्येका समलंकरोति मुद्रण ई-मेल

वाणी
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते ।
संस्कृत अर्थात् संस्कारयुक्त वाणी हि मानव को सुशोभित करती है ।

 
वाणी-वाक्संयमी हि सुदुसःकरतमो मुद्रण ई-मेल

वाणी
वाक्संयमी हि सुदुसःकरतमो मतः ।
वाणी पर संयम रखना अत्यंत कठिन है ।

 
वस्त्र-कुवस्त्रता शुभ्रतया मुद्रण ई-मेल

वस्त्र
कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते ।
खराब वस्त्र भी स्वच्छ हो तो अच्छा दिखता है ।

 
वस्त्र-जिता सभा वस्त्रवता मुद्रण ई-मेल

वस्त्र
जिता सभा वस्त्रवता ।
अच्छे वस्त्र पहननेवाले सभा जित लेते हैं (उन्हें सभा में मानपूर्वक बिठाया जाता है) ।

 
वस्त्र-वस्त्रेण किं स्यादिति मुद्रण ई-मेल

वस्त्र
वस्त्रेण किं स्यादिति नैव वाच्यम् ।
वस्त्रं सभायामुपकारहेतुः ॥
अच्छे या बुरे वस्त्र से क्या फ़र्क पडता है एसा न  बोलो, क्योंकि सभा में तो वस्त्र बहुत उपयोगी बनता है !

 
लोभ-क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः मुद्रण ई-मेल

लोभ
क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः ।
लोभ की वजह से मोहित हुए हैं वे दुःखी होते हैं ।

 
लोभ-लोभः प्रज्ञानमाहन्ति मुद्रण ई-मेल

लोभ  
लोभः प्रज्ञानमाहन्ति ।
लोभ विवेक का नाश करता है ।

 
लोभ-लोभमूलानि पापानि । मुद्रण ई-मेल

लोभ
लोभमूलानि पापानि ।
सभी पाप का मूल लोभ है ।

 
लोभ-लोभात् प्रमादात् मुद्रण ई-मेल

लोभ
लोभात् प्रमादात् विश्रम्भात् त्रिभिर्नाशो भवेन्नृणाम् ।
लोभ, प्रमाद और विश्र्वास – इन तीन कारणों से मनुष्य का नाश होता  है ।

 
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