सूक्तियाँ
शरीर-कायः कस्य न वल्लभः मुद्रण ई-मेल

शरीर 
कायः कस्य न वल्लभः ।
अपना शरीर किसको प्रिय नहीं है ?

 
शरीर-शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् मुद्रण ई-मेल

शरीर
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।
शरीर धर्म पालन का पहला साधन है ।

 
शरीर-त्रयः उपस्तम्भाः मुद्रण ई-मेल

शरीर 
त्रयः उपस्तम्भाः ।
आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।
शरीररुपी मकान को धारण करनेवाले तीन स्तंभ हैं; आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य (गृहस्थाश्रम में सम्यक् कामभोग) ।

 
शरीर-सर्वार्थसम्भवो देहः मुद्रण ई-मेल

शरीर
सर्वार्थसम्भवो देहः ।
देह् सभी अर्थ की प्राप्र्ति का साधन है ।

 
वृद्ध-श्रोतव्यं खलु मुद्रण ई-मेल

वृद्ध
श्रोतव्यं खलु वृध्दानामिति शास्त्रनिदर्शनम् ।
वृद्धों की बात सुननी चाहिए एसा शास्त्रों का कथन है ।

 
वृद्ध-वृध्दा न ते ये मुद्रण ई-मेल

वृद्ध
वृध्दा न ते ये न वदन्ति धर्मम् ।
जो धर्म की बात नहीं करते वे वृद्ध नहीं हैं ।

 
वृद्ध-न तेनवृध्दो भवति मुद्रण ई-मेल

वृद्ध
न तेनवृध्दो भवति येनाऽस्य पलितं शिरः ।
बाल श्वेत होने से हि मानव वृद्ध नहीं कहलाता ।

 
वाणिज्य-सत्यानृतं तु वाणिज्यम् मुद्रण ई-मेल

वाणिज्य
सत्यानृतं तु वाणिज्यम् ।
सच और जूठ एसे दो प्रकार के वाणिज्य हैं ।

 
वाणिज्य-वाणिज्ये वसते लक्ष्मीः मुद्रण ई-मेल

वाणिज्य
वाणिज्ये वसते लक्ष्मीः ।
वाणिज्य में लक्ष्मी निवास करती है ।

 
वाणी-अभ्यावहति कल्याणं मुद्रण ई-मेल

वाणी
अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता ।
अच्छी तरह बोली गई वाणी अलग अलग प्रकार से मानव का कल्याण करती है ।

 
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