अथ प्रजानामधिपः प्रभाते मुद्रण

अथ प्रजानामधिपः प्रभाते जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम् । 
वनाय  पीतप्रतिबद्धवत्सां यशोधनो धेनुमृषेर्मुमोच ॥ १ ॥

रात्रि के बीत जाने पेर यश के धनी, प्रजापालक, राजा दिलीप ने प्रातःकाल सुदक्षिणा द्वारा दी हुई गन्धमाला को ग्रहण करने वाली, दूध पीकर बँधे हुए बछड़े वाली, महर्षि वसिष्ठ की नन्दिनी गौ को वन में चराने के लिए खोल दिया ।