व्रताय तेनानुचरेण मुद्रण ई-मेल

व्रताय तेनानुचरेण धेनोन्यॅषेधि शेषोप्यनुयायिवगॅः ।
न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा, स्ववीर्यगुप्ता हि मनोः प्रसूति ॥ ४ ॥

व्रत के लिए नन्दिनी के पीछे चलने वाले राजा दिलीप ने शेष नौकरों को भी लौटा दिया । उनके शरीर  की रक्षा के लिए दुसरो के आवश्यकता न थी, क्योंकि मनु की संतान अपने पराक्रम से रक्षित होती है ।

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