मात्रा मुद्रण

ह्रस्व/दीर्घ/प्लुत उच्चार

संस्कृत की अधिकतर सुप्रसिद्ध रचनाएँ पद्यमय है अर्थात् छंदबद्ध और गेय हैं । इस लिए यह समज लेना आवश्यक है कि इन रचनाओं को पढते या बोलते वक्त किन अक्षरों या वर्णों पर ज़ादा भार देना और किन पर कम । उच्चारण की इस न्यूनाधिकता को “मात्रा” द्वारा दर्शाया जाता है ।

*   जिन वर्णों पर कम भार दिया जाता है, वे हृस्व कहलाते हैं, और उनकी मात्रा 1 होती है । अ, इ, उ, लृ, और ऋ ये ह्रस्व स्वर हैं ।

*   जिन वर्णों पर अधिक जोर दिया जाता है, वे दीर्घ कहलाते हैं, और उनकी मात्रा 2 होती है । आ, ई, ऊ, ॡ, ॠ ये दीर्घ स्वर हैं ।

*   प्लुत वर्णों का उच्चार अतिदीर्घ होता है, और उनकी मात्रा 3 होती है जैसे कि, “नाऽस्ति” इस शब्द में ‘नाऽस्’ की 3 मात्रा होगी । वैसे हि “वाक्पटु” इस शब्द में ‘वाक्’ की 3 मात्रा होती है । वेदों में जहाँ 3 (तीन) संख्या दी हुई रहती है, उसके पूर्व का स्वर प्लुत बोला जाता है ।

*   संयुक्त वर्णों का उच्चार उसके पूर्व आये हुए स्वर के साथ करना चाहिए । पूर्व आया हुआ स्वर यदि ह्रस्व हो, तो आगे संयुक्त वर्ण होने से उसकी 2 मात्रा हो जाती है; और पूर्व अगर दीर्घ वर्ण हो, तो उसकी 3 मात्रा हो जाती है और वह प्लुत कहलाता है ।

*   अनुस्वार और विसर्ग – ये स्वराश्रित होने से, जिन स्वरों से वे जुडते हैं उनकी 2 मात्रा होती है । परंतु, ये अगर दीर्घ स्वरों से जुडे, तो उनकी मात्रा में कोई फर्क नहीं पडता (वह 2 ही रहती है) ।

*   हलन्त वर्णों (स्वरहीन व्यंजन) की पृथक् कोई मात्रा नहीं होती ।

*   ह्रस्व मात्रा का चिह्न ‘।‘ है, और दीर्घ मात्रा का ‘ऽ‘ ।

*   पद्य रचनाओं में, छंदों के पाद का अन्तिम ह्रस्व स्वर आवश्यकता पडने पर गुरु मान लिया जाता है ।

समजने के लिए कहा जाय तो, जितना समय ह्रस्व के लिए लगता है, उससे दुगुना दीर्घ के लिए तथा तीन गुना प्लुत के लिए लगता है । 


नीचे दिये गये उदाहरण देखिए :

राम = रा (2) + म (1) = 3 याने “राम” शब्द की मात्रा 3 हुई ।
वनम् = व (1) + न (1) + म् (0) = 2
मीमांसा = मी (2) + मां (2) + सा (2) = 6
पूर्ववत् = पूर् (2) + व (1) + व (1) + त् (0) = 4
ग्रीष्मः = ग्रीष् (3) + म: (2) = 5
शिशिरः = शि (1) + शि (1) + रः (2) = 4
कार्तिकः = कार् (2) + ति (1) + कः (2) = 5
कृष्णः = कृष् (2) + णः (2) = 4
हृदयं = हृ (1) + द (1) + यं (2) = 4
माला = मा (2) + ला (2) = 4
त्रयोदशः = त्र (1) + यो (2) + द (1) + शः (2) = 6

संस्कृत छंदों को समजने के लिए मात्राओं का ज्ञान होना अति आवश्यक है । मात्रा के नियम उच्चारशास्त्र के सर्व सामान्य नियम हैं, और इनके बिना संस्कृत भाषा में शुद्धि अशक्य है । छंदों की सामान्य माहिती इस वेब साइट में अन्य स्थान पर दी गयी है । मात्राओं का अधिकतम उपयोग उस विभाग में आप देख पायेंगे ।    


अन्य भारतीय भाषाओं का उद्गम संस्कृत होने से, उन में भी मात्रा व छंदों के ये ही नियम पाये जाते हैं ।