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संस्कृत की यह एक विशेषता है कि उसकी प्राचीन कृतियाँ लिखित नहि बल्कि मौखिक परंपरा से टिकी । गेय (पद्य) होने से वे समाज में संस्कार और संस्कृति के स्वरुप में स्थिर हुई । चरित्र और आत्मदीप से प्रकट हुई ये रचनायें ‘श्रुति’ (सुनी हुई) कहलायीं । मौखिक शैली के इस सविशेष स्थान की वजह से, संस्कृत में उच्चार शुद्धि के नियमों का भी व्याकरणतुल्य महत्त्व है । शब्द की व्युत्पत्ति से लेकर उसके व्यक्तिकरण तक समस्त प्रक्रिया को वैज्ञानिक और सम्यक् बनाने का वैदिकों ने प्रयत्न किया, जिससे कि सुननेवाला वही समजे और उसी भाव से समजे जो कहनेवाले को अपेक्षित हो । शब्द और भाषा की इस गहराई की वजह से, ‘शब्द’ को भारतीय दर्शन ने ‘ब्रह्म’ का स्थान दिया, और उसके स्फोट को सिद्धि का । और भी एक दार्शनिक सिद्धांत था जिसने मौखिक परंपरा को सुदृढ बनाया; वह था ‘वस्तुनिष्ठा का गौणत्व’ । इन्सान को आत्मनिष्ठा तक ले जाने का मार्ग भला किताबों के ज़रीये कैसे हाँसिल हो सकता था ? अर्थात् उन्हों ने इन्सान की श्रुतिशक्ति और स्मृतिशक्ति को विकसित करे ऐसी मौखिक परंपरा को चुना । वैदिकों की ईच्छा नीतिमूल्यों को संस्थापित कर व्यक्ति और समाज को प्रगत बनाने की थी, और न कि उच्च कोटि का साहित्य पैदा करने की, जो केवल पंडितों की चर्चाओं तक सीमित रहे ! इस लिए उन्हों ने मृत लेखित पद्धत की जगह पर, जीवंत ऐसी मौखिक पद्धत उठायी जिस में बोलनेवाले के चरित्र का प्रतिबिंब हो । बोलने से वक्ता के मन पर Auto Suggestion का संस्कार हो जाता है, और श्रवण द्वारा श्रोताओं पर Mass Appeal भी । मानव स्पर्श और वैयक्तिक आवश्यकताएँ ध्यान में लेनेवाली मौखिक परंपरा हो तो Mass Media की आवश्यकता क्या अपने आप कम नहि हो जाय ? यहाँ इस बात को भी ध्यान में लेना आवश्यक है कि संस्कृत में पद्य को मुखोद्गत करना भी अत्यावश्यक समज़ा गया है । यूँ कहो कि मुखपाठ करना संस्कृत की अभ्यास पद्धति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है । जो मुखोद्वत होगा वह टिकेगा और कभी न कभी ज्ञात भी होगा ऐसी संभावना है । इतनी पूर्वभूमिका के बाद उच्चार शुद्धि के सर्वसामान्य नियम समज लेते हैं । उच्चारण के नियम ‘शिक्षा’ ग्रंथों में पाये जाते हैं जो कि छे वेदांगों में से एक हैं । वैदिक वाङ्ग्मय के नियम या उच्च स्तर के शुद्धि-नियम इस वेब साइट की भूमिका के बाहर है; अर्थात् सामान्य संस्कृत जिज्ञासु को आवश्यक इतने नियम ही यहाँ संकलित किये जाते हैं ।
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