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इस छन्द को श्लोक भी कहते हैं । इसके अनेक भेद हैं, परंतु जिस का अधिकतर व्यवहार हो रहा है, उसका लक्षण इस प्रकार से है:
श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् । द्विचतुः पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥
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शार्दूलविक्रीडित छन्द के प्रत्येक चरण में 19 वर्ण निम्नलिखित क्रम से होते हैं:
सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।
सूर्य (12) और अश्व (7) पर जिसमें यति होती है और जहाँ वर्ण मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और एक गुरु के क्रम से रखे जाते हैं, वह शार्दूलविक्रीडित छन्द होता है; जैसे:
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शिखरिणी छन्द के प्रत्येक पाद में 17 वर्ण होते हैं और पहले 6 तथा फिर 11 वर्णों के बाद यति होती है । इस का लक्षण इस प्रकार से है:
रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी
जिसमें यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और लघु तथा गुरु के क्रम से प्रत्येक चरण में वर्ण रखे जाते हैं और 6 तथा 11 वर्णों के बाद यति होती है, उसे शिखरिणी छन्द कहते हैं; जैसे:
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इन्द्रवज्रा छन्द के प्रत्येक चरण में 11-11 वर्ण होते हैं । इस का लक्षण इस प्रकार से है:
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।
इसका अर्थ है कि इन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और दो गुरु के क्रम से वर्ण रखे जाते हैं । इसका स्वरुप इस प्रकार से है: ऽऽ । ऽऽ । ।ऽ । ऽऽ तगण तगण जगण दो गुरु
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मन्दाक्रान्ता छन्द में प्रत्येक चरण में मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु वर्णों पर यति होती है । यही बात इस लक्षण में कही गई है:
मन्दाक्रान्ताऽभ्बुधिरसनगैर्मो भनौ तौ ग-युग्मम् । क्यों कि अम्बुधि (सागर) 4 हैं, रस 6 हैं, और नग (पर्वत) 7 हैं, अतः इस क्रम से यति होगी और मगण, भगण, नगण, तगण, तगण और दो गुरु वर्ण होंगे ।
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इस छन्द के भी प्रत्येक चरण में 11-11 वर्ण होते हैं । लक्षण इस प्रकार से हैं:
उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ
इस का अर्थ यह है कि उपेन्द्रवज्रा के प्रत्येक चरण में जगण, तगण, जगण और दो गुरु वर्णों के क्रम से वर्ण होते हैं । इस का स्वरुप इस प्रकार से है:
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जिस छन्द में कोई चरण इन्द्रवज्रा का हो और कोई उपेन्द्रवज्रा का, उसे उपजाति छन्द कह्ते हैं । इसका लक्षण और उदाहरण पद्य में देखिए:
अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः । इत्थं किलान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम॥
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मालिनी 15 वर्णों का छन्द है, जिसका लक्षण इस प्रकार से है:
न-न-मयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः ।
इसका अर्थ है कि मालिनी छन्द में प्रत्येक चरण में नगण, नगण, मगण और दो यगणों के क्रम से 15 वर्ण होते हैं और इसमें यति आठवें और सातवें वर्णों के बाद होती है; जैसे :
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इस छन्द के प्रत्येक चरण में 12-12 वर्ण होते हैं, जिस का लक्षण और स्वरुप निम्नलिखित है:
द्रुतविलम्बितमाहो नभौ भरौ
अर्थात् द्रुतविलम्बित छ्न्द के प्रत्येक चरण में नगण, भगण, भगण और रगण के क्रम से 12 वर्ण होते हैं ।
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यह चौदह वर्णों का छन्द है । तगण, भगण, जगण, जगण और दो गुरुओं के क्रम से इसका प्रत्येक चरण बनता है । पद्य में लक्षण तथा उदाहरण देखिए:
उक्ता वसन्ततिलका तभजाः जगौ गः ।
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इस छन्द में चार यगणों के क्रम से प्रत्येक चरण बनता है, जिसका पद्य-लक्षण और स्वरुप यह है:
भुजङ्गप्रयातं चतुर्भिर्यकारैः
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वंशस्थ या वंशस्थविल:
इस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः जगण, तगण, जगण और रगण के क्रम से 12 वर्ण होते हैं । पद्य में लक्षण और उदाहरण देखिए:
वदन्ति वंशस्थविलं जतौ जरौ
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