आज्ञापालन मुद्रण

Aagnapalanहिमालय की गोद में एक ऋषि का सुंदर आश्रम था । उस आश्रम में ऋषि के साथ अनेक शिष्य भी रहते थे । वे आश्रम के दैनिक नित्यक्रम में रहकर ऋषि के मार्गदर्शन से जीवन की शिक्षा लेते थे॑ । आश्रम का सारा काम शिष्य ही संभालते थे । साथ मिलकर रहना और काम करना यही अपने आप में एक बडा़ शिक्षण था । इसके अलावा ऋषि के साथ बैठकर जीवन के अलग अलग पाठ सिखने का अवसर भी मिलता ।

आश्रम के दैनिक नित्यक्रम में ऋषि ने सुबह की प्रार्थना, योगासन और ध्यान को अधिक महत्व दिया था । किंतु उन्होंने पाया की शिष्यों का ध्यान के प्रति लगाव कम ही था क्योंकि वे लगातार स्थिर बैठ नहीं पाते थे और उनका मन आसपास की बातों में भटकते रहता था । शिष्यों की इस समस्या के निवारण के लिए ऋषि ने एक उपाय सोचा ।

अगले दिन सुबह जब ध्यान का समय हुआ तब ऋषि ने शिष्यों को एक आज्ञा दी । ध्यान में बैठने से पहले हर शिष्य को भीतर के एक कक्ष में जाकर वहाँ रखा दीप लेना होगा, उसमें पास रखे बर्तन में से घी लेकर डालना होगा, दीप को प्रज्वलित करना होगा और उस दीप को बिना बुझाए बाहर लाकर अपने सामने ध्यान करते समय रखना होगा । शिष्य ऋषि की आज्ञा अनुसार रोज़ ऐसा करने लगे । इससे ऐसा हुआ कि रोज़ सुबह ध्यान में बैठने से पहले ही शिष्यों का मन दीप को बुझने न देने की वजह से दीप में ही एकाग्र हो जाता था और आसपास की बातें मन से निकल जाती थी । इससे धीरे धीरे मन को ध्यान लगने की आदत होने लगी और ऋषि अपने आशय में सफल हुए ।

एक दिन ऋषि ने सोचा कि शिष्यों की परिक्षा लेनी चाहिए । उस दिन वे सुबह ही किसी काम के बहाने आश्रम से बाहर चले गये । रोज़ के अनुसार शिष्यों ने तो अपना नित्यक्रम शुरू किया । जब ध्यान का समय हुआ तब ऋषि की आज्ञा के अनुसार वे दीप प्रज्वलित करने अंदर के कक्ष में गये । लेकिन उस दिन उन्होंने पाया कि अंदर रखे बर्तन में घी ही नहीं था । अब उनके सामने एक समस्या थी कि बिना घी के दीप को प्रज्वलित कैसे करें और फिर ध्यान में कैसे बैठें ? उस दिन सभी शिष्यों का मन ध्यान में नहीं लग पाया क्योंकी उनका मन दीप को प्रज्वलित न कर पाने की वजह से अस्वस्थ था ।

जब ऋषि आश्रम वापस लौटे और शिष्यों की समस्या सुनी तब वे हँस पडे़ और शिष्यों को जीवन का नया पाठ समझाया । आज्ञापालन यह एक महत्त्व का मूल्य है । लेकिन किसी भी आज्ञा के पीछे एक हेतु होता है । अगर उस हेतु को समझे बिना ही आज्ञा का पालन होगा तो कई बार इस प्रकार की गड़बड़ हो सकती है । ऋषि की आज्ञा के पीछे का हेतु शिष्यों के मन को शांत व एकाग्र करने का था जिससे मन ध्यान में लग सके । दीप यह मन को एकाग्र करने का मात्र एक साधन था । कई दिनों की साधना के बाद मन उस साधन के बिना ही ध्यान में लग सकता था । किंतु यह विचार न होने की वजह से जब शिष्यों के पास दीप न था तब उनका मन अस्वस्थ हो गया । अगर ऋषि की आज्ञा के पीछे का आशय वे समझ लेते तो उस दिन भी वे बिना दीप के ही रोज़ के अनुसार ध्यान में बैठ पाते थे ।

इस कहानी का मर्म यही है कि आज्ञापालन यांत्रिकता से नहीं होना चाहिए । शायद इसी तरह हम अनेक धार्मिक कर्मकांड भी, यांत्रिकता से, बिना उनके पीछे का आशय समझे ही करते है । जब आज्ञापालन ऐसा कर्मकांड बन जाता है तब उसका मूल्य कम हो जाता है ।

इसी कहानी के द्वारा हम इस विषय के बारे में और अधिक सोच सकते हैं । क्या आप बता सकते है किन व्यक्तियों की आज्ञा का पालन होना चाहिए? क्या हर बडे़ व्यक्ति की आज्ञा का बिना सोचे पालन करना योग्य होगा? मेरी राय में उन्हीं व्यक्तियों की आज्ञा का पालन होना चाहिए जिनका हेतु शुद्ध हो । आज्ञापालन का मूल्य तब है जब उस आज्ञा के पीछे विकासार्थ लक्ष्य या हेतु हो ।

आप भी इस विषय के बारे में आप की राय हमें ज़रूर भेजें । आपको इस विषय पर आगे सोचने के लिए आईए इस कहानी को एक मोड़ देते है । सोचिए कि अगर आश्रम के कुछ शिष्यों ने ऋषि की आज्ञा के पीछे का आशय समझ लिया हो और उनका ध्यान बिना दीप लिए ही अच्छे से लगता हो, तो क्या उनका रोज सुबह ऋषि की आज्ञा के विरूद्ध बिना दीप लिए ही ध्यान में बैठना उचित होगा?

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