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आजका सुविचार

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त्रयः कालकृताः पाशाः शक्यन्ते न निवर्तितुम् ।
विवाहो जन्म मरणं यथा यत्र च येन च ॥

विवाह, जन्म, और मरण ये कालांतरगत है, अनिवार्य है । ये जैसे, जहाँ, और जिसके साथ होने होते हैं, वैसे हि होते हैं ।


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किं मिष्टमन्नं खरसूकराणाम्
किं रत्नहारः मृगपक्षिणां च ।
अंधस्य दीपः बधिरस्य गीतम्
मूर्खस्य किं शास्त्रकथा प्रसंगः ॥

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का सम्पदविनीतस्य का मैत्री चलचेतसः ।
का तपस्या विशीलस्य का कीर्तिः कोपवर्तिनः ॥ 

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अथाहिंसा क्षमा सत्यं ह्रीश्रद्धेन्द्रिय संयमाः ।
दानमिज्या तपो ध्यानं दशकं धर्म साधनम् ॥

अहिंसा, क्षमा, सत्य, लज्जा, श्रद्धा, इंद्रियसंयम, दान, यज्ञ, तप और ध्यान ये दस धर्म के साधन है ।


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वर्जनीयो मतिअमता दुर्जनः सख्यवैरयोः ।
श्र्वा भवत्यपकाराय लिहन्नपि दशन्नपि ॥

मतिमान मनवको दुष्टके साथ मैत्री या बेर नहीं करना चाहिए । कुत्ता चाटता है तो भी और काटता है तो भी नुकसान हि करता है ।  

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तस्याग्निर्जलमर्णवः स्थलमरिर्मित्रं सुराः किंकराः
कान्तारं नगरं गिरि र्गृहमहिर्माल्यं मृगारि र्मृगः ।
पातालं बिलमस्त्र मुत्पलदलं व्यालः श्रृगालो विषं
पीयुषं विषमं समं च वचनं सत्याञ्चितं वक्ति यः ॥ 

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मूर्खे नियोज्यमाने तु त्रयो दोषाः महीपतेः ।
अयशश्र्चार्थनाशश्र्च नरके गमनं तथा ॥

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विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः ।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परं दैवतम्
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥

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अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥

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बाल्यादपि चरेत् धर्ममनित्यं खलु जीवितम् ।
फलानामिव पक्कानां शश्वत् पतनतो भयम् ॥ 

बचपन से हि धर्म का आचरण करना (उचित है), जीवन अनित्य है । (शरीर को) पके हुए फल की तरह गिरने का सदैव भय होता है ।

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विश्व को क्या देंगे ? केवल हिंदुत्त्व ? छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व
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वैदिकधर्म विचार (भा. १)

मार्च का समय था । दसवीं कक्षा के इम्तेहान सर पे आ रहे थे । सतीश उसके मित्रों के साथ बडे इत्मनान से उसकी तैयारीयों में लगा हुआ था । एकाएक शहर का व्यवहार ध्वस्त हो गया । किसी कट्टर मजहबी नेता की धरपकड से दंगे फसाद सुरु हो गये थे । बच्चों का घर से आना-जाना सुरक्षित नहीं था । दोस्तों का मिलना बंद हुआ, साथ में होनेवाली पढाई भी रुक गई ।

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वैदिक संपदा, विश्व संपदा छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. २)

आज शनिचर है । कॉलेज में अंतिम दो लेक्चर्स कॅन्सल हुए, तो प्रतीक मिहिर को अपने घर खाने पर ले गया । घर पहुँचकर दोनों ने रसोई में हाथ बँटाया, क्यों कि मिहिर के आने से माँ को अपना रसोई कार्यक्रम बदलना पडा था । दोनों ने मिलकर खीर पकायी और फिर खाना खाकर दिवानघर में बातें करने बैठ गये । 
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आर्यावर्त: यथा विचार तथा आचार छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. 3)

अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥
 

जो स्वयं सभी शास्त्रों का अर्थ जानता है, दूसरों के द्वारा ऐसा आचार स्थापित हो इसलिए अहर्निश प्रयत्न करता है; और ऐसा आचार स्वयं अपने आचरण में लाता है, उन्हें आचार्य कहते है ।

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अंतःकरण शुद्धि और चारित्र्य निर्माण छापें ई-मेल
चिंतन - दार्शनिक चिंतन

Image भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है - उच्च चारित्र्य का निर्माण नचिकेता, राजा जनक, महर्षि वेदव्यास, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिळक, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेक चरित्र इस भव्य संस्कृति की अमूल्य देन है भारतीय इतिहास के हर काल हर क्षेत्र में ऐसे उच्च चरित्र का होना हमारी संस्कृति की गरिमा तथा यशस्वीता का प्रतीक है । 

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विश्व या अजूबा ! छापें ई-मेल
चिंतन - आधुनिक विज्ञान

Image “It is a terrible thing to see and have no vision”. हेलन कॅलर के इन शब्दों में चर्म चक्षु की मर्यादा व्यक्त होती है । क्या मतलब यदि आँखें हो पर दृष्टि न हो ! दृष्टि हो पर दर्शन (दृष्टिकोण और ध्येय) न हो !

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