आजका सुविचार

The average pencil is seven inches long, with just a half-inch eraser - in case you thought optimism was dead.

चिन्ताज्वरो मनुष्याणां क्षुधां निद्रां बलं हरेत् ।
रूपमुत्साहबुध्दिं श्रीं जीवितं च न संशयः ॥

The fever of worry snatches away hunger, sleep, strength, beauty, enthusiasm, mind, wealth and life itself - there is no doubt.

"चिंता" स्वरुप ज्वर (बुखार) भूख, नींद, बल, सौंदर्य, उत्साह, बुद्धि, समृद्धि और स्वयं जीवन को भी हर लेता है ।

 
मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धः बुभुक्षितः ।
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश ॥

मद्य पीया हुआ, असावध, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधी, डरपोक, भूखा, त्वरित, लोभी, और विषयलंपट – ये दस धर्म को नहीं जानते (अर्थात् उनसे संबंध नहीं रखना चाहिए) ।

 
आयु र्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमौषध मैथुने ।
दानं मानापमानौ च नव गोप्यानि कारयेत् ॥

आयुष्य, वित्त, गृहछिद्र, मंत्र, औषध, मैथुन, दान, मान, और अपमान – ये नौ बातें गुप्त रखनी चाहिए ।

 
उद्योगः कलहः कण्डू र्मद्यं द्यूतं च मैथुनम् ।
आहारो व्यसनं निद्रा सेवनात् विवर्धते ॥

उद्योग, कलह, खुजली, मद्य, मैथुन, आहार, व्यसन, द्यूत, और निद्रा, सेवन करने से बढते हैं ।

 
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरस्तथा ।
मनसा वचसा दृष्टया प्रणामोऽष्टाङ्गमुच्यते ॥

हाथ, पैर, घूटने, छाती, मस्तक, मन, वचन, और दृष्टि इन आठ अंगों से किया हुआ प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहा जाता है ।

 
नाम्नि किम् विशेषम् मुद्रण ई-मेल
“नाम में क्या रखा है !” यह वाक्य कीर्तिविषयक हो तब तो ठीक है, पर वैयक्तिक नामाभिधान के अनुसंधान में अगर हो, तो उसे ज्यादा अर्थ नहीं, क्यों कि नाम तो potential energy जितना शक्तिशाली होता है । पर विशेष विचार किये बगैर यह बात सहसा ध्यान में नहीं अाती ।

अाज के Digital Age में इन्सान की identity एक से अनेक होती जा रही है । जन्म के साथ मिले हुए नाम से शुरू होनेवाली identity, credit cards या smart cards की digital identity में, अथवा वेब साइट्स के usernames में उलज जाती है । बचपन में खिलौनों से खेलनेवाला बालक, बडा होने के बाद भी केवल खेलते ही रहता है; यह है कि उसके खिलौने थोडे sophisticated हो जाते हैं जिन्हें हम gadgets (इलेक्ट्रीक उपकरण) कहते हैं ।

घर के स्क्वेर फीट से लेकर, सत्ता, डीग्री या कीर्ति का फैलाव, smart cards के नंबर्स और चाइनीझ खिलौनों में (उपकरणों में) उल्झा हुअा इन्सान अपने जीवन का मूलभूत कार्य भूल जाता है । यह न हो, और हर इन्सान अपने जीवन को कुछ निश्चित दिशा दे, इसी लिए मनुष्य का नामकरण किया जाता है । अन्य योनियों में यह परंपरा कम ही होगी, या होगी तो भी इस समज पूर्वक नहीं होगी, इसी लिए "नामकरण" को ऋषियों ने "संस्कार" का दरज्जा दिया । नामकरण विश्व की सभी सभ्यताओं में अति प्राचीन काल से चली अा रही परंपरा है, फिर भी इस विषय पर लगभग विचार नहीं किया जाता । बहुधा सामान्य लगनेवाली "नामकरण" की घटना अासान होने के बावजुद वास्तव में इतनी भी सामान्य नहीं है । इस विषय में सोचना उपयुक्त होगा ।

वेद कहते हैं "नमः अर्भकेभ्यः" - बच्चों को नमस्कार । तेजस्वी जीवन की गरिमा समजानेवाले वेद कर्तृत्वहीन बच्चों को नमस्कार क्यों कहते हैं, यह विचारणीय है । बच्चे भव्य भविष्य का अाशास्रोत है, यह बात तो सीधी सीधी समज में अाती है; पर मानव-बालक को कुछ विशिष्ट भूतकाल है, पूर्वजन्म के कर्म और संस्कार है, यह बात केवल वेद ही सुस्पष्ट रुप से समजाते हैं । उन्नत कर्मों की वजह से मानव-जन्म प्राप्त होता है, यह वैदिक धारणा है (causation theory), और इसी लिए मनुष्य बालक को नमस्कार है कि वह उन्नत योनि में जन्मा । साथ ही साथ जन्म लेने की घटना, भृण रचना कौशल्य, बालक की निर्दोषता, निर्लेपता, और बालस्मित को भी नमस्कार है ।

किंतु नमस्कार करने में, वेदों को केवल स्थूल नमस्कार अभिप्रेत नहीं है । बालकों को नमस्कार करना अर्थात् उनको अपनी उपासना का साधन बनाना । सामान्यतः बच्चे पालकों की महत्त्वाकांक्षाओं का, मनोरंजन का या फिर वासना तृप्ति का निमित्त जाने-अनजाने में बन जाते हैं । वेद कहते हैं कि बच्चे हमारी उपासना का साधन बनने चाहिए । विकास की इस विशिष्ट दृष्टि से सोचें तो पालक पर केवल बालक-विकास की ही नहीं बल्कि शिशुवर्धन द्वारा स्वयं अपने विकास की जिम्मेदारी भी अपने ही सर पे है । पालक-बालक के बीच ऐसा अन्योन्य संबंध हमारी संस्कृति ने समजाया है । हालाँ कि अाज-कल देखने यह मिलता है कि पालक केवल बालकों का ही विकास करने के नाद में अपनी सही भूमिका भूल बैठत हैं, और कुछ अलग नाद में पड जाते हैं । Capitalism की स्पर्धात्मकता ने वहाँ भी अपना अड्डा खूब जमा लिया है !

अन्योन्य विकास के इस सफर में पालकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है । उनका स्थान बालक के पूर्वकर्म और उनके भवितव्य - इन दोनों के ठीक बीच में स्थित होता है, जहाँ उनसे एक अपेक्षा है बालक को सुयोग्य नाम देने की । दो बातें अाज-कल सभी पालक सोचते हैं कि नाम छोटा हो, और नया हो ! पर इनसे अतिरिक्त सविशेष बातों की ओर दुर्लक्ष होता बहुधा दिखायी देता है । जीवन साथी ढूँढने में जिस तरह सावधानी बर्ती जाती है, वैसे ही "नाम" अाजीवन साथ रहनेवाला होने से, "नामकरण" के प्रति भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए जैसे कि;z

  • नाम को दिशा-सूचक मूल्य होना चाहिए । अर्थात् नाम अर्थपूर्ण होना चाहिए - यह अाग्रह सभी सभ्यताओं में समान नहीं दिखायी देता है, क्यों कि हर सभ्यता की समज और परंपरा भिन्न भिन्न है । परंतु, नाम किसी सकारात्मक गुण का द्योतक हो सकता है या फिर किसी चरित्र का । हर बालक (बालिका) में भविष्य की अनंत अाशा छीपी हुई है, इस लिए वह श्रेष्ठ इतिहास की केवल पुनरुक्ति कर सकता है ऐसा नहीं, बल्कि गौरवपूर्ण इतिहास के अाधार पर अचिंत्य, अमूर्त्य भावि भी खडा कर सकता है । "नाम" बालक की अंतर्निहित संभावना को अभिव्यक्त करने का और पुष्ट करने का सबसे सहज, सरल फिर भी अति समर्थ साधन बन सकता है ।

Education शब्द लेटिन भाषा से उत्पन्न हुअा है, जिसकी व्युत्पत्ति होती है educere याने की bring forth what is within (अांतरिक क्षमताओं को अवकाश कर देना) । विवेकपूर्ण नामकरण याने अाजीवन शिक्षण के लिए उपयुक्त घरेलु साधन ।

  • फेशन के नाद में पडकर "नाम" का सहज मूल्य खत्म नहीं करना चाहिए । शब्द में असीम ताकत होती है । "गुलाब जामुन" बोलने के बाद उस वस्तु का चित्र सहसा मन के सामने खडा हो जाता है, उसका रस भी मन को स्पंदित करने लगता है । "मामा" बोलने के बाद ५०० माइल दूर रहनेवाले मामा को मन सामने ला धरता है ! इतनी शब्द की ताकत है ! इस लिए शब्द का अवमूल्यन करना या उसका न्यून अाकलन करना - यह मूर्खता है ।

  • “नाम" जीवन में लाखों दफा उपयुक्त होता है । दिन में १० के हिसाब से, ३६५ दिन और ७५ साल में करीब तीन लाख बार वह कम से कम दोहराया जाता है; इसमें "नाम" के स्वयं-सूचक मूल्य (Auto suggestive value) को ध्यान में लेना चाहिए । किसी बच्चे या व्यक्ति को बार बार "मूर्ख" या "बुद्धु" कहने से जैसे नकारात्मक ग्रंथि पैदा होती है, ठीक उसी प्रकार उसे किसी अर्थपूर्ण या दिशा-सूचक नाम से पुकारने से उसमें सकारात्मक ग्रंथि उद्युक्त की जा सकती है । इस लिए "नाम" के इस गुणधर्म का उपयोग तो सुयोग्य रुप से कर ही लेना चाहिए ।

  • नाम में कुल या परिवार की विशेष परंपरा, संस्कार अथवा गुण का प्रतिध्वनि भी व्यक्त किया जा सकता है । इससे कुल की प्रतिभा बनाये रखने का और कुल को उत्तरोत्तर उन्नतिशील बनाने का सूचन सहसा बालक को प्राप्त होता है । "कुटुंब”, संस्कार और संस्कृति के बीच महत्त्वपूर्ण सेतु समान है, क्यों कि संस्कार का वहन व्यक्ति करता है, और संस्कृति का वहन समाज । वैयक्तिक मूल्यों के कुटुंबीकरण बिना उन मूल्यों का सामाजिकीकरण अस्थायी होता है । "नाम" का योगदान इस हेतु को फलित करने में अति मूल्यवान हो सकता है ।

  • नाम भाषा के नियमों के अंतर्गत होना चाहिए । इस ओर विशेष ध्यान न बरतने से "नाम" किसी एक भाषा के दायरे में नहीं पडता, या फिर उस में लिंग-वचन का विवेक नहीं रह जाता । उदा. नाम संस्कृत में है या प्राकृत भाषा में यह मालुम न होना । संस्कृत के लिंग नियम, प्राकृत नियमों से अलग है - यह अगर मालुम न हो, तो अनजाने ही लिंग परिवर्तन हो जाता है । या फिर नाम दो भाषाओं का hybrid हो जाता है । ऐसा होना सही है या गलत - उस चर्चा में न पडते हुए, ऐसे नाम अर्थपूर्ण हो, उसका ध्यान तो कम से कम रखना चाहिए ।

  • हो सके तब तक केवल समाज में रुढ हुए अर्थों या फिर सार्वजनिक बाल-नामावलि वेब साइट्स के अाधार पर नाम तय नहीं करना चाहिए । अधिकृत शब्दकोष के जरीये चुने हुए नामों की समालोचना कर लेनी चाहिए । कभी कभी चुने हुए नाम के एक से ज्यादा अर्थ हो सकते हैं, और समाज में कम रुढ हुअा अर्थ बेढंगा हो सकता है । भविष्य में बालक को अपने नाम से शरमिंदगी न हो, इसका खयाल रखना चाहिए ।

  • जिस तरह बेढंगे या अभाषिक नाम नहीं होने चाहिए, उसी तरह बहुत उच्च अर्थवाले शब्दों का भी नाम के रुप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए । जैसे कि ब्रह्म, ओम, ईश्वर, वेद, वेदांत, परमेश्वर इत्यादि; या फिर वैसे शब्द जो की पदवी वाचक हैं, जिन्हें केवल कुछ सविशेष परिश्रम से ही कमाया जाना चाहिए उदा. ब्रह्मर्षि, ऋषि, स्नातक, अाचार्य इत्यादि । अवतारों के नाम, महान ऋषियों के नाम या अन्य श्रद्धास्थानों के नामों का उपयोग भी वर्ज्य समजना चाहिए उदा. राम, कृष्ण, व्यास, वसिष्ठ इत्यादि । इन शब्दों को व्यक्ति एवं समाज के अाध्यात्मिक विकास के लिए अारक्षित रखने चाहिए । उनका अवमूल्यन या अवमानित उपयोग न हो, यह अति अावश्यक है । वैयक्तिक और व्यावहारिक नाम कई दफा अति क्रोध से, कभी सविशेष लाड से या कभी अावेग में लिये जाते हैं - कभी कभी उन्हें तरोड मरोड भी दिया जाता है उ.दा. “राम" यह नाम - “रामा" घाटी के साथ एकरुप हो गया है । भगवान तो सर्वव्यापी है, किंतु उनके नाम की अामन्या तो रखनी चाहिए ।

    अर्थात् कहने का अभिप्राय ऐसा नहीं है कि देवी-देवताओं के नाम रखने ही चाहिए । हमारे पुराणों में ३३ करोड देवी-देवताएँ कहे गये हैं, याने वैसा तो असंभव है और अनावश्यक भी । पर कुछ नामों को अनामत रखना चाहिए ।

    हर देश में कंपनीयों के नामकारण के कानून होते हैं, उस विषय में कुछ विधि-निषेध होते हैं । राष्ट्र के मान, सन्मान को हानि पहुँचाने वाले नाम मंजुर नहीं किये जाते । तो क्या संस्कृति की गरिमा का रक्षण करने का खयाल, वैयक्तिक नामकरण में नहीं रखना चाहिए ?

    कई देशों में तो वैयक्तिक नामों के लिए भी सरकार की मंजुरी लेनी पडती है, ताकि राष्ट्र के सन्मान या देश की सभ्यता के दायरे में ही बच्चों का नामकरण किया जाये । हमारे यहाँ सरकार वैसे ही बहुत ज्यादा बोज उठाकर बैठी है, अर्थात् बेहतर यही होगा अगर पालक विवेक बुद्धि का उपयोग करें ।

    इस तरह थोडी विचारपूर्णता से, नाम के जरीये उन्नत भविष्य का बीज बालक में बोया जा सकता है । सुजलां सुफलां शस्य शामलां भारतभूमि, सुप्रजां बनें उसमें पालकों का योगदान शिक्षकों जितना ही महत्त्वपूर्ण है ।

Comments (2)
  • Shripad  - नामे किम् विशेषम्

    महोदय,

    मेरे खयालसे "नामे किम् विशेषम्" इस का व्याकरण सही नहीं है | पहला शब्द "नामे" नहीं, बल्कि "नाम्नि" होना चाहिए |

    धन्यवाद !

    श्रीपाद अभ्यंकर

  • sseditor  - धन्यवाद

    सुधार सूचित करने के लिए धन्यवाद ।

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