आजका सुविचार

Anyone who stops learning is old, whether at 20 or 80. Anyone who keeps learning stays young. The greatest thing in life is to keep your mind young.

चिन्ताज्वरो मनुष्याणां क्षुधां निद्रां बलं हरेत् ।
रूपमुत्साहबुध्दिं श्रीं जीवितं च न संशयः ॥

The fever of worry snatches away hunger, sleep, strength, beauty, enthusiasm, mind, wealth and life itself - there is no doubt.

"चिंता" स्वरुप ज्वर (बुखार) भूख, नींद, बल, सौंदर्य, उत्साह, बुद्धि, समृद्धि और स्वयं जीवन को भी हर लेता है ।

 
मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धः बुभुक्षितः ।
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश ॥

मद्य पीया हुआ, असावध, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधी, डरपोक, भूखा, त्वरित, लोभी, और विषयलंपट – ये दस धर्म को नहीं जानते (अर्थात् उनसे संबंध नहीं रखना चाहिए) ।

 
आयु र्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमौषध मैथुने ।
दानं मानापमानौ च नव गोप्यानि कारयेत् ॥

आयुष्य, वित्त, गृहछिद्र, मंत्र, औषध, मैथुन, दान, मान, और अपमान – ये नौ बातें गुप्त रखनी चाहिए ।

 
उद्योगः कलहः कण्डू र्मद्यं द्यूतं च मैथुनम् ।
आहारो व्यसनं निद्रा सेवनात् विवर्धते ॥

उद्योग, कलह, खुजली, मद्य, मैथुन, आहार, व्यसन, द्यूत, और निद्रा, सेवन करने से बढते हैं ।

 
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरस्तथा ।
मनसा वचसा दृष्टया प्रणामोऽष्टाङ्गमुच्यते ॥

हाथ, पैर, घूटने, छाती, मस्तक, मन, वचन, और दृष्टि इन आठ अंगों से किया हुआ प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहा जाता है ।

 
स्मृति: जरा मेरा भी स्मरण कर लो (२) मुद्रण ई-मेल
(....भाग १ से चालु)
इन प्रश्नोंके उत्तर खोजने के लिए "स्मृति" की सांस्कृितक औरअाध्यात्मिक भूमिका के बारेमें सोचना अावश्यक है, क्योंकि विज्ञान, वाणिज्यऔर प्रचलित धर्म - इनसभी ने यह काम बडी चतुराई से सामान्य मानव के कंधों पर डालदिया है ।

अंतःकरणमें स्मृति का स्थानः

भारतीय दर्शन और संस्कृति मे स्मृति का स्थान विशेष है ।

  • स्मृति का स्थान समजने के लिए अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के विविध अंगों को समज लेना चाहिए ।

  • अंतर्विश्व:
    अहंकार – अलगता का अहेसास
    बुद्धि – संकल्पात्मिका – thesis, antithesis, synthesis, तर्क-कुतर्क
    मन – विकल्पात्मक, भावसंपुट
    चित्त – संस्कार क्षेत्र
  • बहिर्विश्व
    बहिष्करण: ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ, पँचतन्मात्राएँ, सभी विषय, ज्ञेय, उपास्य, साधन, समाज, प्रकृति इ.
  • अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के बीच निरंतर लेन-देन होती रहती है ।
  • अंतर्विश्व के कार्य: Receipt Function और Respond Function
  • अंतर्सृष्टि: तर्क, कुतर्क, चिकित्सा, कौतुहल, अन्वेषण, विश्लेषण, संश्लेषण, विकल्प, संकल्प, संवेदना, भावार्द्रता, और अनेक प्रकार के भावों से एकरुपता - जैसे रुद्रता, भीरुता, वात्सल्य, पलायनता, वीरता, मोहितता, व्यग्रता इत्यादि ।
  • मन स्मृतिसंपुट और भावसंपुट है, तथा चित्त संस्कार संपुट ।
  • चित्त रुपी संस्कार क्षेत्र में बाह्य एवं अांतरिक सभी गतिविधीयों का - बुद्धि, स्मृति, भाव-भावनाएँ अादि का परिणाम निरंतर होता रहता है । ...स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् । (यो.सू.)
  • स्मृति: आंतरिक विश्व और बाह्य विश्व के बीच सेतु समान है ।

  • लेन-देन की प्रक्रिया मे बेंक की तरह “संभालने” का काम स्मृति करती है ।
  • अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृति: । (यो.सू.)
  • स्मृति में वस्तु, व्यक्ति, Inferences, Information, अनुभव – सभी कुछ register हो जाता है, और कृति या व्यवहार में इन सबका प्रतिबिंब दिखायी पडता है ।
  • संबंधों में भी पूर्वग्रहों का प्रतिबिंब व्यक्त होता है, जो स्मृति में अंकित रहते हैं ।
  • अपने आप की Personality और Character विषयक Impressions भी जीवनभर स्मृतिपट पर रहती है ।

आंतरिक विकास में स्मृति की भूमिका

  • सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में स्मृति Catalyst (सहायक) जैसी है ।

  • इसी लिए गीता में भगवान ने स्मृति को विभूति बतलायी है;
  • कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा (श्री.गीता १०-३४)
  • नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा...."स्मृतिलोप" अर्जुनविषाद का एक प्रमुख कारण है ।
  • श्रवण और चिंतन का क्या अर्थ यदि वे स्मृति में दृढ न होते हों ?!
  • श्रद्धवीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् । (यो.सू.) - स्मृति "योग" का साधन है । सीधे ध्यान की मुद्रा में बैठने से योग नहीं हो जाता । स्मृतिपरिशुद्धौ...(यो.सू.) - स्मृति की शुद्धि अावश्यक है ।
  • बुद्धि से भी स्मृति जादा बलवान है – क्यों कि "सस्कार" के अतिरिक्त, कृति की अंतिम उद्दीपक स्मृति है ।
  • जैसे कि "ईश्वरप्रेम" – इसकी केवल समज पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी निरंतर स्मृति रहे वह आवश्यक है ।
  • इसी लिए वेदांत ने श्रवण, मनन, निदिध्यासन की साधन-त्रयी बतलायी; क्यों कि मनन और निदिध्यासन के बिना "श्रवण" की या अध्ययन की गहराई नहीं बढती ।
  • दूसरों की गलतीयाँ और दोषों का हमें सहज स्मरण हो जाता है, जैसे कि बोलीवुड के गानें या महत्त्वाकांक्षा शायद ही कभी हमारे दिमाग से ओझल होते हैं ! 
  • भारतीय दर्शन कहता है; महत्त्वाकांक्षा की नहीं, ध्येय की स्मृति रहनी चाहिए

  • ईश्वर विषयक स्मृति; उसका अस्तित्व, कृपा, प्रेम, संबंध और दिये हुए वचन की स्मृति
  • आत्मस्वरुप की स्मृति रहनी चाहिए ।

  • चित्तएकाग्रता करना याने क्या करना ? स्मृति याने Retention | सत्य की, ईश्वर की धारणा करना याने “एकाग्र होना” ।
  • ईश्वर ने की हुई मदत, उनके गुण, संबंध और स्वरुप का अचल स्मरण याने "ध्यान" ।
  • यदि स्मृति ही विकसित न हो, तो अांतरिक – अात्मिक उपासना कैसे शक्य हो सकती है ?
  • इस लिए अंतःकरण के अन्य पहेलुओं के साथ साथ स्मृति को भी सुयोग्य आकार देना होगा ।
  • जीवनविकास याने Object से Subject की ओर प्रवास, और Subject को व्यापक करनेका प्रयास ।
  • स्मृतिशुद्धि, अंतःकरणशुद्धि का मुख्य हिस्सा है ।
  • अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । या अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । ऐसे अनेकविध वचनों के द्वारा गीताकार ने स्मृति-महिमा की ओर निर्देश किया है ।

शिक्षण में “स्मृति” विषयक सांप्रत प्रवाह

  • क्षणिक स्मरण-शक्ति की बोलबोला – रट्टा मारो, गुणांक पाओ

  • स्पर्धात्मक स्मरण-शक्ति – GK में Master, तो लगोगे Smarter, और बढोगे Faster
  • “Change is the ONLY Constant” – बदल और उसकी तेज रफ्तार - दीर्घ स्मृति रखकर क्या मतलब ?
  • तकनीकी विकासः External Memory और Artifical Intelligence
  • Information Age में छोटी सी chip पर कितना कुछ store किया जा सकता है, तो स्मृति को कष्ट देकर क्या फायदा ?
  • माहिती प्रधानता – धर्म और नीति विषयोंमें भी माहिती केन्द्रितता

  • इतर प्रवृत्ति – अंधा अनुकरण, अनेकानेक प्रवृत्तियों में व्यस्त रखने की वृत्ति; स्मृति उपासना के लिए समय ही नहीं
  • चरित्र निर्माण और आत्मिक विकास – स्पर्धात्मक स्मृति का इनसे कोई वास्ता नहीं
  • बुद्धि प्रधानता – व्यावहारिक और व्यावसायिक बुद्धि पर ही सब लक्ष्य; शुद्ध बुद्धि के लिए भी न्यून अवकाश
  • मानसिक विकास – भाववृद्धि, भावसंतुलन और स्मृतिशुद्धि की ओर दुर्लक्ष
  • जब कि भाव का शुद्धिकरण गीता ने तप कहा है; भावसंशुद्घिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते (श्री. गीता १७-१६)

इसी रफ्तार से यदि चलते रहें, तो स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥गी. २-६३॥ ऐसी स्थिति दूर नहीं । रहे - सहे सांस्कृतिक मूल्य भी भारतीय जीवन-प्रणालि से अगली पीढी तक लुप्त हो जायेंगे ।

ऋषियों ने मानवी विकास में स्मृति का महत्त्व पहचाना था; और इसी लिए स्मृति विकास को दैनं-दिन जीवन में समाविष्ट कर लिया था ।

स्मृति परत्व भारतीय संस्कृति

विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥

जिसमें विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता और क्रियाशीलता - ये छे गुण है, उसके लिए असाध्य कुछ भी नहीं है । मानवी जीवन को गौरव प्रदान करनेवाले इन गुणों में "स्मृति" को शास्त्रकारों ने स्थान दिया, और उसे विकासात्मक मोड देने का प्रयत्न किया ।

  • मौखिक परंपरा
    वेद की शाखएँ और वैदिक वाङ्ग्मय सहस्र वर्षों तक मौखिक परंपरा से टीकाये

  • स्मरण में सरलता रहे इस लिए जादातर वाङ्ग्मय पद्यमय
    संगीत और ज्ञान का इतना अनन्य संयोग हुआ कि “छंद” ग्रंथों को वेदांग में स्थन मिला ।
    वेदाभ्यासार्थ छंदों का अभ्यास अनिवार्य है ।
  • श्लोक, सूत्र, मंत्र इत्यादि कंठस्थ करने का आग्रह

  • दिन में कु्छ न्यूनतम पारायण या जप का आग्रह
    तज्जपस्तदर्थभावनम् । (योगसूत्र)
    यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (श्री.गीता १०)
  • अष्टांग योग में यम, नियम...इत्यादि बतलाकर ध्यान से पहले, “धारणा” की पगथी
  • नियत रुप से श्रवण, मनन, प्रार्थना और अभ्यास (पुनरावर्तन) का महत्त्व
  • ईश्वर, ऋषि, सद्चरित्रों, सद्विचारों और तीर्थों का “स्मरण”
  • श्राद्ध और पितृतर्पण द्वारा कुटुंब के श्रेष्ठ चरित्रों और मूल्यों को याद करना
  • साधन परायण नहीं, पर सत्त्व परायण शिक्षण
  • स्मृति विकास को अात्मनिष्ठ विकास का उपांग बनाया; अत्यधिक gadgets का उपयोग वस्तुनिष्ठा का द्योतक है
  • पंच महायज्ञों के अनुष्ठान का आग्रह – यज्ञ याने होम-हवन नहीं, पर यज्ञ याने निःस्वार्थ संबंध और ईश्वर प्रीत्यर्थ कृति । स्मृति और कृति को इतनी बेहतरी से जोड दिया । 

जीवन विकास में स्मृति का योगदान इतना महत्त्वपूर्ण है कि वैदिकों ने शास्त्रों के एक अंग को ही “स्मृति” कहा – नीति और कृति को सीधा स्पर्श करनेवाली; जिसकी विस्मृति होने से मानवी जीवन और सामाजिक जीवन ध्वस्त होता है, वे "स्मृति" ग्रंथ ।

वैदिकों को क्या अब भी केवल कर्मकांडी कहेकर छोड देना ठीक होगा ?

अर्जुन जैसी आत्म-स्मृति कब हो क्या मालुम ! पर प्रामाणिक प्रयत्न करने पर, मन की स्मृति रुप विशिष्ट क्षमता का अाकार-लाभ जरुर हो सकता है; नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा...


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