आजका सुविचार

Some people dream of success... while others wake up and work hard at it.

चिन्ताज्वरो मनुष्याणां क्षुधां निद्रां बलं हरेत् ।
रूपमुत्साहबुध्दिं श्रीं जीवितं च न संशयः ॥

The fever of worry snatches away hunger, sleep, strength, beauty, enthusiasm, mind, wealth and life itself - there is no doubt.

"चिंता" स्वरुप ज्वर (बुखार) भूख, नींद, बल, सौंदर्य, उत्साह, बुद्धि, समृद्धि और स्वयं जीवन को भी हर लेता है ।

 
मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धः बुभुक्षितः ।
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश ॥

मद्य पीया हुआ, असावध, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधी, डरपोक, भूखा, त्वरित, लोभी, और विषयलंपट – ये दस धर्म को नहीं जानते (अर्थात् उनसे संबंध नहीं रखना चाहिए) ।

 
आयु र्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमौषध मैथुने ।
दानं मानापमानौ च नव गोप्यानि कारयेत् ॥

आयुष्य, वित्त, गृहछिद्र, मंत्र, औषध, मैथुन, दान, मान, और अपमान – ये नौ बातें गुप्त रखनी चाहिए ।

 
उद्योगः कलहः कण्डू र्मद्यं द्यूतं च मैथुनम् ।
आहारो व्यसनं निद्रा सेवनात् विवर्धते ॥

उद्योग, कलह, खुजली, मद्य, मैथुन, आहार, व्यसन, द्यूत, और निद्रा, सेवन करने से बढते हैं ।

 
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरस्तथा ।
मनसा वचसा दृष्टया प्रणामोऽष्टाङ्गमुच्यते ॥

हाथ, पैर, घूटने, छाती, मस्तक, मन, वचन, और दृष्टि इन आठ अंगों से किया हुआ प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहा जाता है ।

 
स्मृति: जरा मेरा भी स्मरण कर लो मुद्रण ई-मेल
Human Memoryगांधीजी के सिद्धांत और उनकी व्यवहार्यता बहुधा चर्चास्पद रहे हैं, किंतु उनका जीवन प्रामाणिक इन्सान को निश्चित ही प्रेरणादायी लगा है । कभी कभी तो जीवन से भी उनकी मृत्यु ज़ादा प्रभावी लगती है ! किसी भी प्रकार की पूर्वसूचना दिये बगैर इतना सहसा मृत्यु अा मिला, फिर भी संपूर्ण सज्ज; मुख से निकला "हे राम" ! ये कोई अकस्मात वाचक शब्द नहीं थे, बल्कि उपासना वाचक शब्द थे; अंतिम क्षण में उन्हें "ईश्वर" का स्मरण हुअा और येशु की तरह क्षमा धर्म का । राष्ट्र के एवं अन्य कई सेवा-कार्यों में अात्यंतिक व्यस्त होने के बावजुद उन किसी बातों का नहीं, बल्कि ईश्वर का स्मरण होना यह कोई सामान्य घटना नहीं है । "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्" (८/५) इस गीता वचन की पुष्टी ही यहाँ दिखाई पडती है ।

अर्थात् मृत्यु के प्रति ऐसे प्रतिभाव का कारण था; अाजीवन की हुई "स्मृति" की अाराधना ।

शिक्षण एवं शिक्षणेतर प्रवर्तमान जीवन शैली ने, अात्मिक विकास को सर्वथा अनावश्यक करार दिया है । ज़ादा से ज़ादा Relaxation, De-stressing, या Heath-tonicजैसी उपयुक्ततावादी दृष्टि से, अथवा Fashion के तौर पर Meditation किया/कराया जाता है । पर अांतरिक विकास में तो "बुद्धि" के कुछ एक मर्यादित विकास को छोडकर अन्य किसी भी इंद्रिय की ओर ध्यान नहीं दिया जाता । "मन" को Physiological ठहराकर उसकी क्षमताओं और उनके विकास की ओर दुर्लक्ष किया जाता है । हर क्षमता को केवल दवाईयों के ज़रीये ठीक करनेका प्रयत्न दिखायी पडता है ।

मन की ऐसी ही एक उपेक्षित क्षमता है "स्मृति" ।


अाधुनिक समय में, विज्ञान के माध्यम से तकनीकी विकास अत्यधिक हुअा दिखायी पडता है । पर हम भूल जाते हैं कि अाधुनिक अाविष्कारों की जननी फिर भी प्रकृति है; कयों कि वैज्ञानिक कई युक्तियाँ येन केन प्रकार से कुदरत से प्रेरित हुई है, जैसे कि विमान पंछीयों से, कम्प्युटर दिमाग से, और कॅमेरा, सूक्ष्मदर्शक या दूरबीन अाँख की भीतरी व्यवस्था के अन्वेषण द्वारा अाविष्कृत हुए हैं ।

ठीक उसी प्रकार हमारे मन की "स्मृति" क्षमता के अन्वेषण द्वारा, विज्ञान ने कई उपकरण और नयी तकनीकों का अाविष्कार किया है । बडे कारखानों के Control Rooms, बेंकों के Information servers, Defence के radars-mainframes, और satellites से लेकर computers, mobiles, medical gadgets या smart cards जैसे वैयक्तिक उपकरण भी आधिभौतिक या कृत्रिम स्मृति के अाधार पर ही कार्य करते हैं । इसExternal और Artificial memory के बिना आधुनिक विश्व की कल्पना अशक्य है ।

व्यावहारिक जीवन में ही ले लो, तो नैसर्गिक स्मृति क्षमता का हम कितना उपयोग करते हैं - यह कभी सोचा है !
सुबह से रात तक उसके आधार पर ही हम जीवन व्यतीत करते हैं: व्यक्ति और वस्तु को पहचानना; etiquettes (चाल-चलन) संभालना; संबंधों को पूर्वग्रहित करना; पसंद-नापसंद निश्चित करना; काम-धंधे से लेकर नीति-धर्ममें, हर क्षेत्रमें अनुकरण करना; तय किये हुए principles या inferences को कार्यान्वित करना; उत्सव, सालगिरह, जिम्मेदारीयाँ याद रखना इत्यादि इत्यादि….

    परंतु नित्य नवीन अाकर्षक उपकरणों की उपलब्धि से नैसर्गिक स्मृति-विकास की उपेक्षा हो रही है । पाश्चात्य देशों में तो "Open Book Exam” प्रचलित हो रही है ! किंतु, इतिहास गवाह है कि दैनंदिन स्मृतिजन्य कामोंमें से जो कुछ काम mechanical उपकरणों को दे दिये जायेंगे, तब भी कुछ और नये कामों से वे रिक्त स्थान पूर्त हो जायेंगे । उल्टा शक्य है कि उससे stress बढ भी जाय उ.दा. आज-कल usernames, passwords, id codes, और बढते रहते contacts को याद रखते रखते हम थक जाते हैं ! प्रश्न यह है कि क्या कृत्रिम स्मृति, नैसर्गिक स्मृति का सर्वथा स्थान ले सकती है ? अर्थात् उपकरणों के अाविष्कार से स्मृति-विकास की ओर दुर्लक्ष करना योग्य है ?  (क्रमशः)

Comments (2)
  • girishkdesh

    बडा ही प्रेरक प्रसंग यहाँ पर उद्घोषित किया है।
    "अन्तकाले च मामेव स्मरन्" । एक त्रिकालाबाधित सत्य यहाँपर लेखक ने पुनरुक्त कर दिया है।
    श्रीराम समर्थ।
    सद्गुरुदेव दत्त।

  • kishtam  - Smruti

    There is conflict on the last words said by Mahatma Gandhi in the book of Nathuram Godse killer of Mahatma Gandhi & Eye witness of last moments of Gandhi. we can take onther example instant of this for smruti.

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