प्रश्नोत्तरी
गुरुपूर्णिमा मुद्रण ई-मेल
प्र. गुरुपूर्णिमा किस चरित्र से जुडी हुई है ?
उ. महर्षि वेद व्यास के चरित्र से । गुरुपूर्णिमा (अाषाढी पूर्णिमा) वस्तुतः 'व्यास पूर्णिमा' कहलाती है । महर्षि व्यास का चरित्र इतना शुभ्र और लोकोत्तर है, जीवन उन्नत और लोकसंग्रहार्थ है, कि वह गुरु शिरोमणि माने गये । उनकी जन्मतिथी 'गुरुपूर्णिमा' कहलायी ताकि सभी गुरुओं के वह अादर्श बनें । उन्हों ने रचा हुअा बहुमुखी वाङमय (पुराणों से लेकर ब्रह्मसू्त्र तक) सदीयों से हर प्रकार के मानव को मार्गदर्शन और चेतना प्रदान करता रहा है । यही वजह है कि उन्हें "भगवान" की संज्ञा देते हुए कहा गया;
 
अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥
उनके चार मुख नहीं, फिर भी जो ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि (विष्णु) है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं, फिर भी शम्भु है; ऐसे भगवान श्री बादरायण (बद्री वृक्ष के तले जन्मे हुए याने व्यास मुनि) है ।

जीवन में सुयोग्य गुरु मिला हो या न हो, गुरुपूर्णिमा के दिन महर्षि वेद व्यास का स्मरण कर उन्हें कृतज्ञ बुद्धि से नमस्कार करना चाहिए ।

 
हिंदु मुद्रण ई-मेल

प्र.  "हिंदु" शब्द का अर्थ क्या है ?
उ.  "सिंधु" नदी के दक्षिण-पूर्व में बसनेवाले लोग । यह जानकर अाश्चर्य होगा कि "हिंदु" यह कोई पारिभाषिक या संस्कृत संज्ञा नहीं है । तिबेट से लेकर पाकिस्तान तक बहनेवाली सिंधु (Sindhu) नदी को ग्रीक में Indus और पर्शियन में हिंदु संज्ञा से पुकारा जाता था । इस वजह से सिंधु नदी के दक्षिण-पूर्व तट पर बसनेवाली जाति को अरबीयों ने हिंदु, और युरोपीयनों ने Indian कहकर पहचाना । इतना ही नहीं, बल्कि यहाँ के धर्म को भी उन्हों ने "हिंदु" नाम दिया । मध्यकालीन युग के अाक्रमणकारीयों ने दी हुई "हिंदु" संज्ञा हम अाज तक बिना सोचे ही इस्तेमाल करते रहे हैं । भारतीय वाङमय में इस धर्म की संज्ञा "वैदिक अथवा सनातन धर्म" ऐसे की गयी है । 

सिंधु नदी का उल्लेख ऋग्वेद में अनेक दफे किया गया है ।

 
महाभारत का लेखन मुद्रण ई-मेल

प्र.  महाभारत का लेखन कार्य किसने किया था ?
उ.  गणेशजी ने । ऐसी पौराणिक कथा है कि महाभारत जैसे विराट ग्रंथ का लेखन कार्य महर्षि व्यास ने गणेश जी को सौंपा । गणेशजी ने इस भगीरथ कार्य का स्वीकार किया, पर वे लेखन में बहुत तेज थे । शेखी में ही उन्होंने शर्त रखी कि महर्षि व्यास सतत बोलते रहेंगे, रुकेंगे नहीं - वर्ना वे लेखन कार्य बीच में ही छोड देंगे । महर्षि व्यास तो ऋषि शिरोमणि थे ! उन्हों ने गणेशजी का प्रस्ताव मान्य किया, पर सामने शर्त रखी कि - गणेशजी समजे बगैर एक भी श्लोक लिखेंगे नहीं । अर्थात् बीच बीच में नयी रचना सोचने का समय महर्षि को सहज ही मिल गया ! वाह ! एक बुद्धि की देवता, तो एक बुद्धि के विजेता !

 
भगवान का प्रश्न मुद्रण ई-मेल
प्र.  गीता में भगवान ने अर्जुन से कोई प्रश्न पूछा है ? कौन सा ?
उ.  हाँ । वैसे तो गीता में अर्जुन ने ही अनेकों प्रश्न पूछे हैं, ऐसी सामान्य समज है । किंतु, उसमें भगवान का भी अर्जुन से एक प्रश्न है, जो कि अठारवें अध्याय में अा जाता है । भगवान पूछते हैं;
कच्चिदेतच्छ्ृतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्य ॥ ७२ ॥
हे पार्थ ! क्या इस (गीताशास्त्र) - को तूने एकाग्रचित्तसे सुना ? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया ?
अर्जुन ध्यानपूर्वक गीता सुने ऐसी भगवान की इच्छा, इस प्रश्न द्वारा प्रकट होती है । श्रौतीय श्रवण चित्तपूर्वक, नहीं कि यांत्रिकता से होना चाहिए - ऐसी भी भगवान की अपेक्षा है । ऐसा श्रवण केवल विद्वत्तार्थ नहीं, बल्कि विकासार्थ होना चाहिए - यह दूसरे प्रश्न में विदित है ।

 
प्रचलित संवाद मुद्रण ई-मेल
प्र.  अादि शंकराचार्य और मंडनमिश्र के संवाद में निर्णायक कौन था ?
उ.  उभय भारती (मंडनमिश्र के पत्नी) । मंडनमिश्र, कुमारिल भट्ट के शिष्य और तत्कालीन भारत के प्रचलित पूर्वमीमांसक थे; और अादि शंकराचार्य प्रचलित उत्तर-मीमांसक । इन दोनों विद्वानों के संवाद में मध्यस्थी कौन कर सकता था ! पर मंडनमिश्र की पत्नी इतनी विदुषी थी कि उनका इस काम के लिए वरण किया गया । अपने पति मंडनमिश्र की हार और संन्यासग्रहण के निर्णय में भी अटल रह पायी, इतनी वह सत्याश्रयी थी ।

 
"वैष्णव" संप्रदाय मुद्रण ई-मेल
प्र.  सांप्रत काल के "वैष्णव" संप्रदायों का पुरातन नाम क्या है ?
उ.
  भागवत धर्म । संसार और अध्यात्म दो भिन्न प्रवाह नहीं हो सकते; बल्कि भक्ति के माध्यम से इन दोनों के बीच सुंदर सेतु बनाया जा सकता है, यह समज प्रस्थापित करनेवाला भागवत धर्म था । अध्यात्म केवल ब्राह्मणों अथवा संन्यासीयों का क्षेत्र नहीं, बल्कि हर एक वर्ण का समान अधिकार क्षेत्र है, जो स्वकर्म करते हुए प्राप्त हो सकता है - ऐसी भागवत धर्म की मान्यता थी । इस लिए परम भागवतों की नामावलि में जनक, अंबरीश और भीष्म जैसे क्षत्रियों को भी नमस्कार किया जाता है । "संत" परंपरा भी भागवत धर्म-दर्शन की ही देन है ।

 
महर्षि नारद मुद्रण ई-मेल
प्र.  महर्षि नारद के भक्तिशास्त्र के सिद्धांत कौन से ग्रंथ में संग्रहित हैं ?
उ.
  "नारद भक्तिसूत्र" में । महर्षि नारद का केवल नटखट चित्रण करना - यह पौराणिकता है । वास्तवतः महर्षि नारद को, भगवान श्रीकृष्ण देवर्षियों में अपनी विभूति बतलाते हैं (....देवर्षीणां च नारदः - गीता १०/२६) । भागवत धर्म और दार्शिनक भक्ति को सभी दिशाओं में पहुँचाने का महद् कार्य महर्षि नारद ने किया है । भक्ति बाह्य अाडंबर में नहीं, बल्कि अंतर्गत बदलाव में है, सूक्ष्म है - इत्यादि श्रेष्ठ मीमांसा उन्होंने भक्तिसूत्रों में की है ।

 
महान संन्यासी मुद्रण ई-मेल
प्र.  १९ वी सदी में वेदों का जीर्णोद्धार करनेवाले महान संन्यासी कौन थे ?
उ.  दयानंद सरस्वती । "सत्यार्थ प्रकाश" जैसे निर्भय ग्रंथ की रचना द्वारा, उन्हों ने संकुचित संप्रदायों की संकीर्णता को उखाड फेंकने का प्रयत्न किया । वेद और वेदांगों का हिंदी अनुवाद कर, उन्हें जन सामान्य के लिए प्रवेशनीय बनाया ।

 
महर्षि वेदव्यास के चार शिष्य मुद्रण ई-मेल
प्र.  महर्षि वेदव्यास के किन चार शिष्यों ने वेदों को संभाला ?
उ.  पैल, वैशंपायन, जैमिनि और सुमन्त; महर्षि वेदव्यास ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अनुक्रम से इन चार शिष्यों को सौंपे ।

 
वैज्ञानिक संशोधन पद्धत मुद्रण ई-मेल
प्र.  अाधुनिक वैज्ञानिक संशोधन पद्धत के प्रणेता कौन है ?
उ.  फ्रान्सीस बॅकन (Francis Bacon) । सोलहवीं सदी के यह अंग्रेज चिंतक व्यवसाय से राजपुरुष और न्यायाधीश थे । पाश्चात्य तत्त्वचिंतन को अाधुनिक विज्ञान की ओर मोड देने में उनका बहुत बडा योगदान रहा । नैंसर्गिक घटनाओं की जाँच Deductive नहीं बल्कि Inductive पद्धत से करनी चाहिए; अर्थात् अनुमान (hypothesis), जाँच, माहिती संकलन, निरीक्षण और निष्कष - इस प्रकार करनी चाहिए, ऐसा उन्होंने समजाया । अागे चलकर यही पद्धत विज्ञान के अनेकानेक अाविष्कारों की जननी बनी । इसके पहले Deductive पद्धत अर्थात् पूर्वनियोजित तथ्यों से सत्यशोधन करने की प्रणालि ही युरोप में ज्यादा प्रचलित थी ।

फ्रान्सीस बॅकन अनुभववाद के प्रणेता माने जाते हैं; और Knowledge is Power यह मुहावरा भी उन्हीं से प्रचलित हुअा ।

 
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