Google Sitemap Generator
मुख्य पृष्ठ arrow गृहस्थी arrow अपि प्रसन्नेन महर्षिणां त्वं
अपि प्रसन्नेन महर्षिणां त्वं छापें ई-मेल
सुभाषित - गृहस्थी

अपि प्रसन्नेन महर्षिणां त्वं सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय ।
कालो ह्ययं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपाकारक्षममाश्रमं ते ॥

तुमसे प्रसन्न होकर क्या महर्षि वरतंतु ने तुम्हें अच्छी तरह शिक्षा देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए अनुज्ञा दी है ? कारण सभी आश्रमों में उपकारक्षम तो गृहस्थाश्रम है, उस में प्रवेश करने का यही समय है । (रघुराजा की कौत्स को उक्ति)


Comments
Search
Only registered users can write comments!

3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."

 
< पिछला   अगला >

[+]
  • Increase font size
  • Decrease font size
  • Default font size
 Type in