“Behavior is a mirror in which every one displays his own image.”
| आशय |
|
|
|
॥ वृत्तेन आर्यो भवति ॥
“संस्कृत भारत भूमि की प्राणभूत व सारभूत भाषा है; अर्थात् संस्कृत के बिना भारत की भव्य संस्कृति, नीतिमूल्यों, और जीवनमूल्यों को यथास्वरुप समजना संभव नहीं । भारत का इतिहास आदर्शों का इतिहास है; आदर्शों से जीना संभव है, यह केवल भारत हि विश्व को बता सकता है । सामंजस्य, प्रेम, त्याग, ईश्वरानुराग, विज्ञान, प्रज्ञान, कला, और धर्म के विशेष प्रयोग इस पुण्यभूमि पर हुए हैं । परंतु मानव इतिहास का यह सुवर्णपृष्ठ, विकसित विश्वमानव को अल्प परिचित ऐसे “संस्कृत” के राजमार्ग से होकर गुज़रता है ! सुभाषित, बोधशास्त्रों, नाट्य, भाष्य, पुराण, इतिहास, और स्मृतियों से होता हुआ ‘संस्कृत’ रुपी राजमार्ग निसर्ग, विद्या, कला, धर्म, ईश्वर, और कर्मयोग ऐसे विविध स्वरुप लेते हुए अंतिमतः श्रुति (वेद, वेदांग और उपांग) और ॐकार में विलीन हो जाता है; या यूँ कहो कि व्यापक हो जाता है । विश्व के अन्य भागों में सभ्यताओं का उदय हो रहा था, तब प्राचीन भारत में श्रेष्ठतम साहित्य का सर्जन हुआ दिखता है; भला, समाजपुरुष की सुदृढ रचना के बगैर क्या ऐसी साहित्य रचना संभव है ? क्या साहित्य सांप्रत जन-मानस का प्रतिबिंब नहीं ? प्राचीन मानव सभ्यताओं के अभ्यास से यह ज़रुर महसुस होता है कि मानव-विकास का हर उत्तर-कांड उसके पूर्व-कांड से श्रेष्ठ हो ऐसा ज़रुरी नहीं; अर्थात् वैदिक काल की कुछ एक बातें अर्वाचीन युग को सर्वथा मार्गदर्शक हो सकती है, और उसे सर्वांगी मानव उत्थान के अभियान में प्रेरक बन सकती है । यह दुर्भाग्य है कि इतिहास के भारतीय सुवर्णपृष्ठ को नत मस्तक हुए बगैर हि, विश्व नये युग का सर्जन करने चला है ! मध्यकालीन समय में सहस्र वर्षों की गुलामी और पराजित मनोवृत्ति ने, और सांप्रत समय में अर्थप्राधान्य ने संस्कृत की गरिमा को नष्ट:प्राय करने का प्रयत्न किया है । परंतु, भूतकाल में बहुधा रौंदी गयी ज्ञान-भाषा क्या पुनः एक बार परास्त होगी ? नहीं; क्यों कि ‘संस्कृत’ तो वह संस्कार है जो हर भारतीय के हृदय में अग्नि के तिन्के की भाँति जीवंत है । उसे थोडा अधिक अवकाश कर देना, यही इस वेब साइट का तात्पर्य है । “संस्कृत” के भव्य राजमार्ग तक ले जानेवाली छोटी ही सही, पर एक पगडण्डी बनाने का यह यत्किञ्चित प्रयत्न है । भावना यह है कि भारत, व भारतीय जीवनमूल्य गतिशील बने रहें; माँ भारती को संस्कृत व आर्यप्रणालि का विशुद्ध प्राणवायु मिलता रहे ! वैसे तो संस्कृत-प्रेमी और संस्कृति-प्रेमी लोग स-अर्थ दिये गये संस्कृत रत्नों का यथा संभव उपयोग कर ही लेंगे, पर अधिक खुशी होगी अगर शिक्षकों और सतर्क माता-पिता को यह वेब साइट उपयुक्त हो सके ! यहाँ संकलित मनीषीयों की वाणी, एखाद इन्सान को भी सत्त्व प्रवृत्त करे तो वह वेब साइट के सार्थक्य के लिए काफी है; परंतु, विद्यार्थीयों की संस्कृत में रुचि और भाषासमागम बढाने के यज्ञ में सम्मिलित होने की भावना भी यहाँ ज़रुर रही है । इस यज्ञ को निम्न तरीके से सराह सकते हैं; जैसे कि,
* सुभाषित पढाना; मुखपाठ कराना; स्पर्धाओं का आयोजन करना । अन्य साधनों की तरह, संस्कृत भी केवल माध्यम है; उन्नत जीवन मूल्यों के आविष्कार बिना, अपने आप में वह पाण्डित्य से अधिक कुछ भी नहीं । किंतु, माध्यम के बगैर, साध्य भी क्या असाध्य नहीं ?
सामान्य संस्कृत से शुरु होनेवाली यह जीवनयात्रा, राष्ट्रभूमि को गौरवमार्ग तक ले जाने में सहायक हो, यही अभ्यर्थना । इस छोटी सी सफर तय करने में, अनेक पूर्वप्रयत्नों की मदत ली है; उन सत्परुषों को, सत्कृत्यों के प्रेरक शिक्षकों, महापुरुषों व ईश्वर को नमस्कार ।
अग्रतः संस्कृतं मेऽस्तु पुरतो मेऽस्तु संस्कृतम् ।
Only registered users can write comments!
Powered by !JoomlaComment 3.26
3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved." |
||||||
| < पिछला | अगला > |
|---|





Powered
By PramukhLib