“You've got to think about big things while you're doing small things, so that all the small things go in the right direction.”
शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च । नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥
बहवो न विरोध्दव्याः दुर्जयास्तेऽपि दुर्बलाः ।स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥
अनेक लोगों का विरोध नहि करना चाहिए । वे दुर्बल हो तो भी दुर्जय बनते हैं । फडकते हुए सांप को भी चींटीयाँ खा जाती है ।
क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेना कार्यकारिणः । प्रच्छन्नपापा जापेन तपसा सर्व एव हि ॥
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
श्रवण (उ.दा. परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (अर्जुन), और आत्मनिवेदन (बलि राजा) - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं ।
भूमिः कीर्तिः यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि । सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् ततः ॥
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥ मृत शरीर को छोडकर जैसे लकडे के टुकडे चले जाते हैं, वैसे संबंधी भी मुँह फेरकर चले जाते हैं । केवल धर्म हि उसके पीछे जाता है ।
विद्वानेव विजानाति विद्वज्जनपरिश्रमम् । नहीं बन्ध्या विजानाति गुर्वीं प्रसववेदनाम् ॥ विद्वानों को कितना परिश्रम होता है, वह केवल विद्वान ही समज सकता है । प्रसूति की पीडा क्या होती है, वह वंद्या नहीं जानती !
विनयायत्ताश्च गुणाः सर्वे विनयश्च मार्दवायत्तः । यस्मिन् मार्दवमखिलं स सर्वगुणभाक्त्वमाप्नोति ॥
अदण्ड्यान् दण्ड्यन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्य दण्ड्यन् । अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥
सत्यहीना वृथा पूजा सत्यहीनो वृथा जपः । सत्यहीनं तपो व्यर्थमूषरे वपनं यथा ॥
उत्तमा आत्मनः ख्याताः पितुः ख्याताश्च मध्यमाः । अधमा मातुलात् ख्याताः श्वशुराश्चाधमाधमाः ॥
जिस की पहेचान आत्मख्याति से हो वह उत्तम, पितृख्याति से हो वह मध्यम, मातुल (मामा) की ख्याति से हो वह अधम, पर ससुर की ख्याति से हो वह अधम में अधम है ।