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आजका सुविचार

The successful person places more attention on doing the right thing rather than doing things right.

कुभोजने दिनं नष्टं कुनार्या यौवनं हतम्
कुपुत्रेण कुलं नष्टं धनं नष्टं न दीयते ॥ 

कुभोजन से दिन बिगडता है; कुनारी से यौवन खत्म होता है; कुपुत्र से कुल नष्ट होता है; और न देने से धन-नाश होता है ।

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कृष्णो योगी शुकस्त्यागी राजानौ जनकराघवौ 
वसिष्ठः कर्मकर्ता च पञ्चैते ज्ञानिनः स्मृताः ॥

योगी श्री कृष्ण, त्यागी शुकदेवजी, राजाओं में जनक और श्री राम, और कर्मरत वसिष्ठ ये पाँच ज्ञानी माने गये हैं ।

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वाग्वैश्वरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम् ।
वैदुष्यं विदुषां तद्वत् भुङ्क्तये न तु मुक्तये ॥

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पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः ।
असम्बध्धप्रलापश्च वाङ्ग्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥

कठोर वचन बोलना, झूठ बोलना, दूसरे की चुगली करना, और बेमतलब बातें करना - ये चार वाणी के पाप है ।
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शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।
नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

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व्योमनि शम्बाकुरुते चित्रं निर्माति यत्नतः सलिले ।
स्नपयति पवनं सलिलैः यस्तु खले चरित सत्कारम् ॥

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सुकरं मलधारित्वं सुकरं दुस्तपं तपः ।
सुकरोक्षनिरोधश्र्च दुष्करं चित्तरोधनम् ॥

मलधारित्व, दुष्कर तप, इन्द्रियों का निरोध करना ये सब आसान है, लेकिन चित्त का निरोध करना मुश्किल है ।

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ये वदन्तीह सत्यानि प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ।
प्रमाणभूता भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥

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नास्ति सत्यसमो धर्मो न सत्याद्विद्यते परम् ।
न हि तीव्रतरं किञ्चिदनृतादिह विद्यते ॥

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अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥

उनके चार मुख नहीं, फिर भी जो ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि (विष्णु) है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं, फिर भी शम्भु है; ऐसे भगवान श्री बादरायण (व्यास मुनि) है ।

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आर्यावर्त: यथा विचार तथा आचार छापें ई-मेल

Image वैदिकधर्म विचार (भा. 3)

अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥
 

जो स्वयं सभी शास्त्रों का अर्थ जानता है, दूसरों के द्वारा ऐसा आचार स्थापित हो इसलिए अहर्निश प्रयत्न करता है; और ऐसा आचार स्वयं अपने आचरण में लाता है, उन्हें आचार्य कहते है ।

आचार्य की इतनी सुंदर व्याख्या, शायद ही किसी और भाषा में हो ! क्या वैदिक विचार और प्राचीन भारत, मानवजीवन के मूलभूत मूल्यों का आचार्य बन सकता है ?

 

वैदिकों के इतिहास ग्रंथों के ज़रीये, अगर पुरातन भारत की ओर दृष्टिपात करें तो आर्यावर्त वैदिक विचारों का प्रतिबिंब था, ऐसा लगे बिना नहीं रहता । दैवी-आसुरी विचारधाराओं का संघर्ष यद्यपि तब भी उतना ही प्रवर्तमान दिखाई देता है, जितना की आज है ! परंतु, सामान्यतः व्यक्ति जीवन और सामाजिक जीवन में गहन तात्त्विक सिद्धांतों का परावर्तन स्पष्ट देखाई पडता है ।

 

तकनीकी विकास का स्तर हर युग में या हर समाज में अलग अलग हो सकता है, पर केवल तकनीकी विकास से मनुष्यत्व का स्तर निश्चित नहीं होता । “(Economic) Development does not tentamount to Welfare” यह तो अर्थशास्त्री भी कुबुल करते हैं । क्या तटस्थ बुद्धि से आर्यावर्त Welfare state की कसौटी में पार उतर सकता है ? इस Presentation में प्रस्तुत की गयी वैदिक धर्म की विशेषताएँ इस उपक्रम में उपयुक्त हो सकती हैं । पर खयाल रहे कि अब धर्म की व्याख्या संप्रदाय के संकुचित अर्थ में नहीं ली गयी, बल्कि समस्त मानवी जीवन को आकार देनेवाले पुरुषार्थ के रुप में प्रयुक्त हुई है ।

 

वैदिक भारत विश्व का आचार्य बने न बने, पर हम अर्वाचीन भारतवासी, उसके नम्र और प्रामाणिक विद्यार्थी बनें, तो वह भी कोई छोटी सिद्धि न होगी !
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