“A loving person lives in a loving world. A hostile person lives in a hostile world; everyone you meet is your mirror.”
| वैदिक संपदा, विश्व संपदा |
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काफ़ी अरसे से भारतीय क्रिकेट टीम का पर्फोर्मंस बुरा चल रहा था । दोनों के बीच इस विषय में लंबी बातें चली । बातों बातों में प्रतीकने कहा, "इस धोनी से तो अब हाथ धो लेने चाहिए; पीछ्ले दस मेचों में कभी भी दस से ज़ादा रन नहीं बनाये !" मिहिर: नहीं यार ! आज-कल उसका शनि चल रहा है । एखाद महिने बाद देखना वह कैसे नये रॅकॉर्ड्स बनाता है ! प्रतीक: और वह युवराज को भी क्या रोग लगा है मालुम नहीं ! उससे तो हमारी गली का प्रसाद अच्छा खेल लेता होगा ! मिहिर: छोड यार ! वह पीछले सप्ताह ही शिर्डी जाकर आया है । कल की मॅच में वह जरुर सॅंचुरी बनायेगा, लिख लेना !
प्रतीक: तूं तो एकदम “वेदिया” है । हर बात को खींच-तान कर या तो
शनि-राहु पर थोप देता है, या फिर सिद्धि-विनायक या शिर्डी पहुँचा देता है ! प्रतीक: माँ, पर ये “वेद” क्या है ? क्या वह “गीता” या “बाइबल” की तरह कोई एक किताब है ? माँ: अं ह (नहीं) । वेद और वैदिक वाङगमय ये तो प्राचीन ऋषियों की अति विस्तृत संपदा है । उन्होंने दिव्य तप और अथाग परिश्रम से इन्सान का जीवन सर्वाँगी, भव्य और दिव्य बनें ऐसा वाङगमय इस धरातल को दिया । उस वाङगमय के विस्तार और सर्वांगीता की सिर्फ कल्पना करोगे तो भी आद्य ऋषियों के लिए नत मस्तक हो जाओगे ।
मिहिर: Aunty, क्या आप हमें इस वाङगमय का सामान्य परिचय करा
सकती हैं ?
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