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आजका सुविचार

A loving person lives in a loving world.  A hostile person lives in a hostile world; everyone you meet is your mirror.

सुखार्थं सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः ।
सुखं नास्ति विना धर्मं तस्मात् धर्मपरो भव ॥

सब प्राणियों की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है, (और) बिना धर्म के सुख मिलता नहि । इस लिए, तू धर्मपरायण बन ।

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पात्रेभ्यः दीयते नित्यमनपेक्ष्य प्रयोजनम् ।
केवलं त्यागबुध्दया यद् धर्मदानं तदुच्यते ॥

किसी प्रकार के प्रयोजन बिना, जो केवल त्यागबुद्धि से दिया जाता है, वही धर्मदान कहलाता है ।

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हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥

हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?

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सप्तैतानि न पूर्यन्ते पूर्यमाणान्यनेकशः ।
ब्राह्मणोऽग्निर्यमो राजा पयोधिरुदरं गृहम् ॥

ब्राह्मण, अग्नि, यमराज, राजा, सागर, पेट और घर -  ये सात, अनेक बार पूर्ण करने पर भी कभी पूर्ण नहीं होते ।

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विद्या शस्त्रं च शास्त्रं च द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।
आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥

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धर्मो मातेव पुष्णानि धर्मः पाति पितेव च ।
धर्मः सखेव प्रीणाति धर्मः स्निह्यति बन्धुवत् ॥

धर्म माता की तरह हमें पुष्ट करता है, पिता की तरह हमारा रक्षण करता है, मित्र की तरह खुशी देता है, और संबंधीयों की भाँति स्नेह देता है ।

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विपत्तिष्वव्यथो दक्षो नित्यमुत्थानवान्नरः ।
अप्रमत्तौ विनीतात्मा नित्यं भद्राणि पश्यति ॥ 

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शर्वरीदीपकश्चंन्द्रः प्रभाते दीपको रविः ।
त्रैलोक्यदीपको धर्मः सत्पुत्रः कुलदीपकः ॥

रात्रि का दीपक चंद्र, प्रभात का दीपक सूर्य, त्रैलोक्य का दीपक धर्म, और कुल का दीपक सुपुत्र है ।

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श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरकर्मणः ।
जन्मकर्म गुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम् ॥

भगवान की लीलाएँ अद्भुत हैं । उनके जन्म, कर्म, और गुण दिव्य हैं । उन्हीं का श्रवण, कीर्तन, और ध्यान करना चाहिए । सब भगवान के लिए करना सीखना चाहिए ।

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वैद्याः वदन्ति कफपित्तमरुद्विकारान्
ज्योतिर्विदो ग्रहगतिं परिवर्तयन्ति ।
भूताभिषंग इति भूतविदो वदन्ति
प्रारब्धकर्म बलवन्मुनयोः वदन्ति ॥ 

(पीडा होने पर) वैद्य कहते हैं वह कफ, पित्त और वायु का विकार है; ज्योतिषी कहते हैं वह ग्रहों की पीडा है; भूवा (बाबा) कहता है भूत का संचार हुआ है, पर ऋषि-मुनि कहते हैं प्रारब्ध कर्म बलवान है (और उसी का यह फल है) ।

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Image वैदिकधर्म विचार (भा. २)

आज शनिचर है । कॉलेज में अंतिम दो लेक्चर्स कॅन्सल हुए, तो प्रतीक मिहिर को अपने घर खाने पर ले गया । घर पहुँचकर दोनों ने रसोई में हाथ बँटाया, क्यों कि मिहिर के आने से माँ को अपना रसोई कार्यक्रम बदलना पडा था । दोनों ने मिलकर खीर पकायी और फिर खाना खाकर दिवानघर में बातें करने बैठ गये । 

काफ़ी अरसे से भारतीय क्रिकेट टीम का पर्फोर्मंस बुरा चल रहा था । दोनों के बीच इस विषय में लंबी बातें चली । बातों बातों में प्रतीकने कहा, "इस धोनी से तो अब हाथ धो लेने चाहिए; पीछ्ले दस मेचों में कभी भी दस से ज़ादा रन नहीं बनाये !"

मिहिर: नहीं यार ! आज-कल उसका शनि चल रहा है । एखाद महिने बाद देखना वह कैसे नये रॅकॉर्ड्स बनाता है !

प्रतीक: और वह युवराज को भी क्या रोग लगा है मालुम नहीं ! उससे तो हमारी गली का प्रसाद अच्छा खेल लेता होगा !

मिहिर: छोड यार ! वह पीछले सप्ताह ही शिर्डी जाकर आया है । कल की मॅच में वह जरुर सॅंचुरी बनायेगा, लिख लेना !

प्रतीक: तूं तो एकदम वेदिया है । हर बात को खींच-तान कर या तो शनि-राहु पर थोप देता है, या फिर सिद्धि-विनायक या शिर्डी पहुँचा देता है !

अब तक माँ ने रसोईघर की सफाई खत्म कर ली थी । वे अंदर प्रतीक-मिहिर की बातें चूपचाप सुन रही थी । वे बाहर आयी, और उन्होंने कहा, "बहुत अच्छा होता अगर मिहिर सचमुच वेदिया होता ! अगर वैदिक वाङगमय पढा होता, तो वह ऐसी बातें कभी नहीं करता ! ग्रहों, देवों या बाबाओं को कभी बीच में नहीं लाता ! वेद तो अति तेजस्वी विचारवाले हैं । इन्सान को आत्मश्रद्धा, कर्तव्यपालन और ब्रह्मउपासना समजाने वाले हैं ।" 

प्रतीक: माँ, पर ये वेद क्या है ? क्या वह गीता या बाइबल की तरह कोई एक किताब है ?

माँ: अं ह (नहीं) । वेद और वैदिक वाङगमय ये तो प्राचीन ऋषियों की अति विस्तृत संपदा है । उन्होंने दिव्य तप और अथाग परिश्रम से इन्सान का जीवन सर्वाँगी, भव्य और दिव्य बनें ऐसा वाङगमय इस धरातल को दिया । उस वाङगमय के विस्तार और सर्वांगीता की सिर्फ कल्पना करोगे तो भी आद्य ऋषियों के लिए नत मस्तक हो जाओगे ।

मिहिर: Aunty,  क्या आप हमें इस वाङगमय का सामान्य परिचय करा सकती हैं ?

माँ: जरुर करा सकती हूँ अगर तुम क्रिकेट, शनि और शिर्डी को थोडी छूट्टी देना चाहो तो !
 

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