अ११ विश्वरुपदर्शनयोग
पस्य मे पार्थ रूपाणि | पस्य मे पार्थ रूपाणि |
|
|
| श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ११ | ||||||
|
श्री भगवानुवाच पस्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधनि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥हे पार्थ अब मेरे सेंकडों, हजारों नाना प्रकारके और नाना वर्ण एवं आकृतिवाले दिव्य रूपोंको देख ।
Only registered users can write comments!
Powered by !JoomlaComment 3.26
3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved." |
||||||
| < पिछला | अगला > |
|---|





Powered
By PramukhLib