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विश्व या अजूबा ! छापें ई-मेल

Image “It is a terrible thing to see and have no vision”. हेलन कॅलर के इन शब्दों में चर्म चक्षु की मर्यादा व्यक्त होती है । क्या मतलब यदि आँखें हो पर दृष्टि न हो ! दृष्टि हो पर दर्शन (दृष्टिकोण और ध्येय) न हो !

सांप्रत समय की प्रत्यक्षवादी और अनुभवमूलक विचारधारा ने केवल इंद्रियजन्य ज्ञान को ही सर्वोत्तम बना दिया है । अर्थात् बाह्य चक्षु से दिखनेवाले अजूबों को या मानव निर्मित अजूबें जैसे कि ताजमहल, या चीनी दिवार को ही हम अजूबें समजते है । पर थोडा सूक्ष्मता से सोचें, अंतःचक्षु का इस्तमाल करें तो अणुमात्र से लेकर खगोलीय स्तर तक, विश्वभर में एक गहरी रचना दिखाई देती है । समस्त सृष्टि ही अजूबा है ! 

सृष्टि के सर्जन मात्र में अभिव्यक्त होनेवाली चेतना, सुव्यवस्था और विस्मितता सर्जित है, उद्भेदित (evolved) है, या अकस्मात है - इस विषय में मतैक्य भले न हो, पर विश्व अजूबा है इस विषय में कोई मतभेद नहीं ।  सर्जन या अकस्मात का निर्णय यूँ भी बुद्धि पर कम और जीवनध्येय या उपासना के स्तर पर ज़ादा आधारित है । Image

इस Presentation के ज़रीये हमारे नज़दीकी विश्व में विहित गहरी रचना की ओर अंगूली निर्देश किया गया है ।  PDF पर क्लिक करें..
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