“Toughness is in the soul and spirit, not in muscles.”
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पश्यति ॥ जो दूसरे की पत्नी को मातृवत् देखता है, दूसरे के द्रव्य को मिट्टी के पिंड भाँति देखता है, और भूत मात्र को आत्मवत् (अपने समान) देखता है, वही सच्चा देखता है ।
अपि प्रसन्नेन महर्षिणां त्वं सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय । कालो ह्ययं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपाकारक्षममाश्रमं ते ॥ तुमसे प्रसन्न होकर क्या महर्षि वरतंतु ने तुम्हें अच्छी तरह शिक्षा देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए अनुज्ञा दी है ? कारण सभी आश्रमों में उपकारक्षम तो गृहस्थाश्रम है, उस में प्रवेश करने का यही समय है । (रघुराजा की कौत्स को उक्ति)
प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा । शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥ प्रेरणा देनेवाले, सूचन देनेवाले, (सच) बतानेवाले, (रास्ता) दिखानेवाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध करानेवाले – ये सब गुरु समान है ।
प्रकृत्यैव विभिद्यन्ते गुणा एकस्य वस्तुनः । वृन्ताकः श्लेष्मदः कस्मै कस्मैचित् वातरोग कृत् ॥
विषधरतोऽप्यति विषमः ख़लः इति न मृषा वदन्ति विद्वांसः । यदयं नकुलद्वेषी स कुलद्वेषी पुनः पिशुनः ॥
दुष्ट मानव सर्प से भी ज़ादा भयंकर है, एसा विद्वान सही कहते हैं । सर्प चाहे नकुल (नोयला) द्वेषी है, फिर भी कुलका द्वेष नहीं करते, लेकिन दुष्ट तो कुल का भी द्वेष करते हैं ।
अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।अधमं याच्यमानं स्यात् सेवादानं तु निष्फलम् ॥
खुद उठकर दिया हुआ दान उत्तम है; बुलाकर दिया हुआ दान मध्यम है; याचना के पश्चात् दिया हुआ दान अधम है; और सेवा के बदले में दिया हुआ दान निष्फल है (अर्थात् वह दान नहीं, व्यवहार है) ।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥
सर्वदेवमयस्यापि विशेषो भूपते रयम् । शुभाशुभ फलं सद्यः नृपाद्देवात् भवान्तरे ॥
विजेतव्या लंका चरण-तरणीयो जलनिधिः ।विपक्षः पौलस्त्यो रण-भुवि सहायाश्च कपयः।तथाप्येको रामः सकल-मवधीद्राक्षसकुलम् क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे ॥
लंका जीतनी थी, पैर से चलकर सागर पार करना था, पुलस्त्य ऋषि के पुत्र (रावण) से शत्रुता थी, रणांगण में (केवल) वानर लोग मदत करनेवाले थे; फिर भी अकेले रामचंद्रजी ने राक्षसों का सारा कुल खत्म कर दिया । महान लोगों को काम में सिद्धि सत्त्व से (आत्मबल से) मिलती है, न कि साधनों से ।
“It is a terrible thing to see and have no vision”. हेलन कॅलर के इन शब्दों में चर्म चक्षु की मर्यादा व्यक्त होती है । क्या मतलब यदि आँखें हो पर दृष्टि न हो ! दृष्टि हो पर दर्शन (दृष्टिकोण और ध्येय) न हो !
सांप्रत समय की प्रत्यक्षवादी और अनुभवमूलक विचारधारा ने केवल इंद्रियजन्य ज्ञान को ही सर्वोत्तम बना दिया है । अर्थात् बाह्य चक्षु से दिखनेवाले अजूबों को या मानव निर्मित अजूबें जैसे कि ताजमहल, या चीनी दिवार को ही हम अजूबें समजते है । पर थोडा सूक्ष्मता से सोचें, अंतःचक्षु का इस्तमाल करें तो अणुमात्र से लेकर खगोलीय स्तर तक, विश्वभर में एक गहरी रचना दिखाई देती है । समस्त सृष्टि ही अजूबा है !
सृष्टि के सर्जन मात्र में अभिव्यक्त होनेवाली चेतना, सुव्यवस्था और विस्मितता “सर्जित” है, “उद्भेदित” (evolved) है, या “अकस्मात” है - इस विषय में मतैक्य भले न हो, पर विश्व अजूबा है इस विषय में कोई मतभेद नहीं । सर्जन या अकस्मात का निर्णय यूँ भी बुद्धि पर कम और जीवनध्येय या उपासना के स्तर पर ज़ादा आधारित है ।