“You may have to fight a bettle more than once to win it.”
| दर्द अनेक, इलाज एक - शिक्षण |
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"जीवन" क्या है; वह कैसा होना चाहिए; मनुष्य
जीवन में कुछ विशेषता होनी चाहिए या नहीं; क्या जीवन को आकार दिया जा सकता है;
जन्मगत प्रकृति और
संस्कारों को उन्नत किया जा सकता है, इत्यादि विषय सदैव
महत्त्वपूर्ण रहे हैं और उस चिंतन के प्रतिध्वनि स्वरुप "शिक्षण" एवं “शिक्षाप्रणालि” वैश्विक सभ्यताओं में आकार लेते
रहे हैं ।
पीछली कुछ सदीयों में औद्योगिक क्रांति और आंतरराष्ट्रीय अर्थकारण ने इस विषय में कई नये आयाम जोड दिये हैं । इतिहास के इस काल में लोकशाही का व्याप बढा और साम्राज्यवाद का अंत हुआ । इससे राजशक्ति (political power) के मुकाबले अर्थशक्ति (मूडीशक्ति - economic power) अधिक बलवान बनी । शिक्षण एवं शिक्षाशास्त्री सुरु में साम्यवाद के और फिर मूडीवाद के गुलाम बनें । परिणाम यह हुआ कि जिज्ञासा, गुणवर्धन, शीलवर्धन, कला-प्रेम और सेवानिष्ठा की जगह माहितीकरण, तकनीकी कौशल, हरीफीकरण और व्यापारीकरण “शिक्षण” से संलग्न हो गये ।
पर क्या वजह थी कि पौर्वात्य जगत में ऋषियों से लेकर श्री अब्दुल कलाम तक, और
पाश्चात्य
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