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आजका सुविचार

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गर्जित्वा बहुदूरमुन्नति-भृतो मुञ्चन्ति मेघा जलम्
भद्रस्यापि गजस्य दानसमये ञ्जायतेऽन्तर्मदः ।
पुष्पाडम्बर यापनेन ददति प्रायः फलानि द्रुमाः
नो छेको नो मदो न कालहरणं दान प्रवृतौ सताम् ॥ 

उन्नत ऐसे बादल, दूर से गर्जना करके पानी देते हैं, भद्र हाथी में भी दान के समय (गण्डस्थल में रस उत्पन्न होते वक्त) मद उत्पन्न होता है, वृक्ष भी पुष्पों का आडंबर दूर करके फल देते हैं; अर्थात् दानप्रवृत्त होने में सज्जनों को दंभ, घमंड या कालहरण होते नहीं ।

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बाल्यादपि चरेत् धर्ममनित्यं खलु जीवितम् ।
फलानामिव पक्कानां शश्वत् पतनतो भयम् ॥ 

बचपन से हि धर्म का आचरण करना (उचित है), जीवन अनित्य है । (शरीर को) पके हुए फल की तरह गिरने का सदैव भय होता है ।

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स्वभावो न उपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥

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रक्षन्ति कृपणाः पाणौ द्रव्यं प्राणमिवात्मनः ।
तदेव सन्तः सततमुत्सृजन्ति यथा मलम् ॥ 

कृपण (लोभी) प्राण की तरह द्रव्य का अपने हाथ में रक्षण करता है, पर संत पुरुष उसी द्रव्य को मल की तरह त्याग देते है ।

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प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा ।
शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः ॥

प्रेरणा देनेवाले, सूचन देनेवाले, (सच) बतानेवाले, (रास्ता) दिखानेवाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध करानेवाले
ये सब गुरु समान है ।

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उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥

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आत्मौपम्येन यो वेत्ति दुर्जनं सत्यवादिनम् ।
स तथा वञ्च्यते धूतैः ब्राह्मणश्छागतो यथा ॥ 

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प्रजां न रक्षयेद्यस्तु राजा रक्षादिभि र्गुणैः ।
अजागल स्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥

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बहुनिष्कपटद्रोही बहुधान्योपधातकः ।
रन्धान्वेषी च सर्वत्र दूषको मूषको यथा ॥

चूहे की तरह दुष्ट भी निष्कपटी लोगों का द्रोह करनेवाला (किमती वस्त्र को खा जाने वाला), ज़ादा करके दूसरेको घात करनेवाला (धान्यका नाश करनेवाला)
और छिद्र ढूँढनेवाला  (दरको ढूँढने वाला) होता है ।

 

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उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् ।
शूरं कृतज्ञं दृढसौह्रदं च
लक्ष्मीः स्वयं याति निवासहेतोः ॥

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दर्द अनेक, इलाज एक - शिक्षण छापें ई-मेल
"जीवन" क्या है; वह कैसा होना चाहिए; मनुष्य जीवन में कुछ विशेषता होनी चाहिए या नहीं; क्या जीवन को आकार दिया जा सकता है; जन्मगत प्रकृति और Image संस्कारों को उन्नत किया जा सकता है, इत्यादि विषय सदैव महत्त्वपूर्ण रहे हैं और उस चिंतन के प्रतिध्वनि स्वरुप "शिक्षण" एवं शिक्षाप्रणालि वैश्विक सभ्यताओं में आकार लेते रहे हैं ।

पीछली कुछ सदीयों में औद्योगिक क्रांति और आंतरराष्ट्रीय अर्थकारण ने इस विषय में कई नये आयाम जोड दिये हैं । इतिहास के इस काल में लोकशाही का व्याप बढा और साम्राज्यवाद का अंत हुआ । इससे राजशक्ति (political power) के मुकाबले अर्थशक्ति (मूडीशक्ति - economic power) अधिक बलवान बनी । शिक्षण एवं शिक्षाशास्त्री सुरु में साम्यवाद के और फिर मूडीवाद के गुलाम बनें । परिणाम यह हुआ कि जिज्ञासा, गुणवर्धन, शीलवर्धन, कला-प्रेम और सेवानिष्ठा की जगह माहितीकरण, तकनीकी कौशल, हरीफीकरण और व्यापारीकरण शिक्षण से संलग्न हो गये ।  

पर क्या वजह थी कि पौर्वात्य जगत में ऋषियों से लेकर श्री अब्दुल कलाम तक, और पाश्चात्य Image जगत में प्लेटो से लेकर आइन्स्टाइन तक सभी की दृष्टि शिक्षण पर लगी रही ! आइए, इस Presentation के ज़रीये  इन श्रेष्ठ व्यक्तिमत्त्वों के शिक्षण विषयक विचारों का थोडा बहुत परिचय और परिशीलन करें । PDF पर क्लिक करें...     

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