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आजका सुविचार

The quality of a person’s life is in direct proportion to his or her commitment to excellence, regardless of his or her chosen field of endeavor.

पञ्चभूतात्मकं वस्तु प्रत्यक्षं च प्रमाणकम् ।
नास्तिकानां मते नान्यदात्माऽमुत्र शुभाशुभम् ॥

प्रत्यक्ष प्रमाण हि प्रमाण है; पञ्चभूतात्मक देह और सृष्टि हि आत्मा है, अन्य नहीं । नास्तिकों के मतानुसार शुभ-अशुभ भुगतना पडता है, ऐसा भी नहीं ।

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शुभकार्ये विलम्बः स्यात् नाशुभे तु कदाचन ।
विलम्बो जायते गेहनिर्माणे न तु पातने ॥ 

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अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभा ।
यत्रास्ते विषसंसर्गोड्मृतमपि तत्र मृत्यवे ॥

अनिष्ट में से इष्ट लाभ होता हो तो फिर भी अच्छा फ़ल नहीं मिलता
, जहाँ विषका संसर्ग हो वहाँ अमृत भी मृत्यु निपजाता है ।


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सर्पदुर्जनयो र्मध्ये वरं सर्पो न दुर्जनः ।
सर्पो दशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे ॥

सर्प और दुर्जन इन दोनों में दुर्जन से साँप अच्छा
क्यों कि सर्प तो समप आने पर हि काटता है, लेकिन दुर्जन तो हर कदम पर काटता है ।

 

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तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गः तृणं शूरस्य जीवनम् ।
जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ॥

ब्रह्मविद् के मन स्वर्ग, शूरवीर को जीवन, जितेन्द्रिय को नारी (या नर), और निस्पृही को जगत तिन्के समान है ।
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शुध्यति भस्मना कांस्यं नारी शीलेन शुध्यति ।
शुध्यति तपसा साधुः गृही दानेन शुध्यति ॥

कांसे का पात्र भस्म से, नारी शील से, साधु तप से, और गृहस्थी दान से शुद्ध होता है ।

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काले ददाति योऽपात्रे वितीर्णं तस्य नश्यति ।
निक्षिप्तमूषरे बीजं किं कदाचिदवाप्यते ॥ 

समय आने पर जो कुपात्र को देता है, उसका दिया हुआ नष्ट होता है । बंजर जमीन पे बोया हुआ बीज क्या कभी वापस मिलता है (उगता है) ?

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स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ताः केसा नखा नराः ।
इति सञ्चिन्त्य मतिमान् स्वस्थानं न परित्यजेत् ॥

दांत, बाल, नाखून, और नर ये यदि स्थानभ्रष्ट हो तो शोभा नहीं देते; ऐसा समजकर, मतिमान इन्सान ने स्वस्थान का त्याग नहीं करना चाहिए ।

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हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् ।
श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥

हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का सत्य, और कान का भूषण शास्त्र है, तो फिर अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता है ?

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न देवाय न धर्माय न बन्धुभ्यो न चार्थिने ।
दुर्जनेनार्जितं द्रव्यं भुज्यते राजतस्करैः ॥

दुर्जन को मिला हुआ धन देवकार्य में, धर्म में, सगे-संबंधीयों या याचक को देने में काम नहीं आता;  उसका उपयोग तो राजा और चोर हि करते है ।

 

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श्रुति र्विभिन्ना स्मृतयोऽपि भिन्ना छापें ई-मेल

श्रुति र्विभिन्ना स्मृतयोऽपि भिन्नाः
नैको मुनि र्यस्य वचः प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्
महाजनो येन गतः स पन्थाः ॥

श्रुति में अलग अलग कहा गया है; स्मृतियाँ भी भिन्न भिन्न कहती हैं; कोई एक ऐसा मुनि नहीं केवल जिनका वचन प्रमाण माना जा सके; (और) धर्म का तत्त्व तो गूढ है; इस लिए महापुरुष जिस मार्ग से गये हों, वही मार्ग लेना योग्य है ।

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