“Anyone who stops learning is old, whether at 20 or 80. Anyone who keeps learning stays young. The greatest thing in life is to keep your mind young.”
एकस्मिन् अक्षिणि काके यदा विज्ञायते पिपत् । ते काकाः मिलिताः सन्तः यतन्ते तन्निवृत्तये ॥
कौए को एक हि आँख होती है । फिर भी जब विपत्ति आती है, तब सब कौए साथ मिलकर उसे दूर करने का प्रयत्न करते हैं ।
सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसः नामापि न श्रूयते मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते । स्वात्यां सागरशुक्ति संपुट्गतं तन्मौक्तिकं जायते प्रायेणाधममध्यमोत्तम गुणाः संसर्गतो देहिनाम् ॥
देयं भो ह्यधने धनं सुकृतिभिः नो सञ्चितं सर्वदाश्रीकर्णस्य बलेश्च विक्रमपते रद्यापि कीर्तिः स्थिता ।आश्चर्यं मधु दानभोगरहितं नष्टं चिरात् सञ्चितम् निर्वेदादिति पाणिपादयुगलं घर्षन्त्यहो मक्षिकाः ॥
निर्धन को धन देना चाहिए क्यों कि सत्पुरुषों ने कदापि उसका संचय नहीं किया, (देखो) श्री कर्ण, बलि और विक्रम की कीर्ति आज तक स्थिर रही है । (दूसरी ओर) आश्चर्य है कि मधुमक्खीयों ने मधु का दीर्घकाल तक केवल संचय ही किया, न तो उसका दान किया और न उपभोग !
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्यात् धिग्दण्डं तदनन्तरम् । तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ॥
एकेनापि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम् । सहैव दशभिः पुत्रैर्भारं वहति रासभी ॥ शेरनी का एक पुत्र हो तो (भी) वह निर्भयता से सो जाती है; पर दस दस पुत्र होने पर भी गदर्भी (गधी) भार हि उठाती है ।
ऋणकर्ता पिता शत्रुः माता च व्यभिचारिणी । भार्या रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुरपण्डितः ॥ कर्जा करनेवाला पिता, व्यभिचारिणी माता, रुपवती स्त्री, और अनपढ पुत्र – शत्रुवत् हैं ।
रविरपि न दहति तादृग् यावत् संदहति वालिका निकरः । अन्यस्माल्लब्धपदः नीचः प्रायेण दुःसहो भवति ॥ रेती के कण जितना जलाते हैं उतना सूर्य भी नही जलाता ! दूसरे के पास से उच्च पद पानेवाला नीच सदैव दुःसह्य होता है ।
निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते । गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते ॥ जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं ।
यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः ।श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम् ॥
फलं यच्छति दातृभ्यो दानं नात्रास्ति संशयः ।फलं तुल्यं ददात्येतदाश्चर्यं त्वनुमोदकम् ॥
दान करने से दान फल देता है उसमें संशय नहि, पर पीछे से वह उतना ही आनंद रुपी फल देता है, वह आश्चर्य है ।