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आजका सुविचार

If you tell the truth you don't have anything to remember.

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखते हैं, और कर्म में अकर्म को देखता हैं, वह इन्सान सभी मनुष्यों में बुद्धिमान है; एवं वह योगी सम्यक् कर्म करनेवाला है ।

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स धर्मो यो दयायुक्तः सर्वप्राणिहितप्रदः ।
स एवोत्तारेण शक्तो भवाम्भोधेः सुदुस्तरात् ॥

जो दयायुक्त और सब प्राणियों का हित करनेवाला हो वही धर्म है । वैसा धर्म ही सुदुस्तर भवसागर से पार ले जाने में शक्तिमान है ।

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परोपकारशून्यस्य धिक् मनुष्यस्य जीवितम् ।
जीवन्तु पशवो येषां चर्माप्युपकरिष्यति ॥

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आदित्य मम्बिकां विष्णुं गणनाथं महेश्वरम् ।
गृहस्थं पूजयेत् पञ्च भुक्तिमुक्त्यर्थसिद्धये ॥

भुक्ति (भोग) और मुक्ति, दोनों के लिए गृहस्थ ने सूर्य, देवी, विष्णु, गणेश, और शिव, इन पाँचों की पूजा करनी चाहिए ।

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बलि र्बिभीषणो भीष्मः प्रह्लादो नारदो ध्रुवः ।
षडेते बैष्णवा ज्ञेयाः स्मरणं पापनाशनम् ॥

बलि, बिभीषण, भीष्म, प्रह्लाद, नारद, और ध्रुव इन छे वैष्णवों का स्मरण करने से पाप का नाश होता है ।

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यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिक्रमः ।
श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम् ॥

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भूमिः कीर्तिः यशो लक्ष्मीः पुरुषं प्रार्थयन्ति हि ।
सत्यं समनुवर्तन्ते सत्यमेव भजेत् ततः ॥ 

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ये च मूठतमा लोके ये च बुध्देः परं गताः ।
ते एव सुखमेधन्ते मध्यमः क्लिश्यते जनः ॥

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गूढमैथुन धाष्टर्ये च काले चालय सङ्ग्रहम् ।
अप्रमादमनालस्यं पञ्च शिक्षेत वायसात् ॥

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नरिकेलसमाकारा दृश्यन्तेऽपि हि सज्जनाः ।
अनये बदरिकाकाराः बहिरेव मनोहराः ॥

 

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चिंतन - सर्व-संयोजन

...स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ (श्री.गीता 17/15)
...सद्विचारों और शास्त्रीय विचारोंका आदान-प्रदान वाङ्मयीन तप है ।

Imageइन्सान अपने संग से पहचाना जाता है यह उक्ति बचपनसे ही हमारे अंतरपट पर अंकित की गयी है, और विचारों से श्रेष्ठ भला और किसका संग हो सकता है ? Image

पर अन्य कई सद्विचारों और संस्मृतियोंकी भाँति यह भी केवल सुवाक्य बन कर रह जाय, ऐसा संभव है । दैनंदिन जीवन और भौतिक विकासकी गतानुगतिक दौड ने
सच्चे जीवन की उपासना को विस्मृत सा करा दिया है ।

वैसे तो जीवन और जीवन को सराहने के विषयमें किताबें, लेख, ई-मैल्स इत्यादि हम अक्सर पढते रहते हैं, पर हमारे ये प्रयत्न बहुधा वांचन तक सीमित रह जाते हैं ! क्या ऐसा नहीं लगता कि सत्यशोधन के प्रवासमें, अपने आपको डूबो देनेके आनंद को हम कहीं न कहीं खो बैठे हैं ?

सद्विचारों का संग किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यावश्यक होता है, क्यों कि वे विचार ही होते हैं जो व्यक्ति का मूक मार्गदर्शन करते हैं और उसे अपनी मंज़िल तक पहुँचाते हैं । तेज रफ्तार वाली आजकी दुनियामें, जहाँ लोगोंको साँस लेकर सोचनेका, या विचार-जगत में डुबकी लगानेका समय नहीं हैं, वहाँ
चिंतन के माध्यम से जीवनमें यह अवकाश खडा करना यह सुसंस्कृत का प्रयोजन है । अविचारी जीवन से विचारी जीवन, सद्विचारी जीवन, और दिव्य विचारी जीवन ऐसी उत्तरोत्तर उन्नति मनुष्यत्व का गौरव-मार्ग है । विचारशीलता, विचार-प्रामाणिकता, और विचार व्यवहार्यता ऐसी त्रिविध उपासना ही संस्कृति का संवर्धन कर सकती है ।

सुसंस्कृत के चिंतन विभाग में कुछ विषय छाँटकर प्रस्तुत किये गये हैं, जिन पर वाचक या सदस्य वर्ग अपने विचार लेख, कहानी, पॉवर-पॉइंट, कॉमिक या अन्य किसी भी स्वरुपमें संपादक को भेज सकते हैं । इनकी आवश्यक समीक्षा करनेके बाद संपादक इन्हें संबंधित विषय-विभाग में प्रकट करेंगे । वैयक्तिक विकासमें आवश्यक है कि इन्सान मननशील और चिंतनशील रहे; अर्थात् अच्छा होगा यदि हम सब किसी न किसी विषयको लेकर अभ्यास जारी रखें, और उन पर अपना मनोगत सुसंस्कृत द्वारा प्रकट करें ।

यह ध्यान रहे कि चिंतन विभाग केवल विचार-विहार का माध्यम नहीं है; यहाँ चूने हुए विषय, केवल विषय नहीं है । इनमें से कुछ विचार वे हैं जिन्होंने जगत के इतिहासको नया मोड दिया, कुछ वे हैं जो हमारे दैनं-दिन जीवनको प्रकाशित कर सकते हैं, और कुछ वे हैं जिन पर विचार और शीघ्र आचार खडे करना, श्रेष्ठ भविष्यके निर्माणमें अनिवार्य है । विचारों की अभिव्यक्ति पाण्डित्य प्रदर्शन के हेतु करना एक बात; और चिंतन-मनन द्वारा विचार-सान्निध्य, आत्म संशोधन एवं संस्कृति निर्माणमें सहायक होना अलग बात । चिंतन का प्रयास है कि हम भारतीय नींवके करीब जायें, उन्हें सूक्ष्मतासे समजें, और भावि निर्माण हेतु उन्हें योगदान देने तुल्य बनायें ।

जिन मन-बुद्धिसे चिंतन-मनन करना है, उस अंतःकरणको ईश्वर विशुद्ध करें; बुद्धि प्रगल्भ, तीक्ष्ण,  चिकित्सक, उदार, सत्त्वानुगामी और निरहंकारी हो; सृजनशीलता उद्युक्त हो; और विचार व्यवहार्य हो । अस्तु ।

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