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...स्वाध्यायाभ्यसनं
चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ (श्री.गीता 17/15)
...सद्विचारों
और शास्त्रीय विचारोंका आदान-प्रदान वाङ्मयीन तप है ।
“इन्सान अपने संग से पहचाना जाता
है” यह उक्ति बचपनसे ही
हमारे अंतरपट पर अंकित की गयी है, और “विचारों” से श्रेष्ठ भला और किसका संग हो सकता है ?
पर अन्य कई सद्विचारों और संस्मृतियोंकी
भाँति यह भी केवल सुवाक्य बन कर रह जाय, ऐसा संभव है । दैनंदिन जीवन और भौतिक
विकासकी गतानुगतिक दौड ने “सच्चे जीवन” की उपासना को विस्मृत सा करा दिया है । वैसे तो “जीवन और जीवन को सराहने” के विषयमें किताबें, लेख,
ई-मैल्स इत्यादि हम अक्सर पढते रहते हैं, पर हमारे ये प्रयत्न बहुधा वांचन तक
सीमित रह जाते हैं ! क्या ऐसा नहीं लगता कि “सत्यशोधन” के प्रवासमें, अपने आपको डूबो देनेके आनंद को हम कहीं न
कहीं खो बैठे हैं ?
सद्विचारों का संग किसी
भी व्यक्ति के लिए अत्यावश्यक होता है, क्यों कि वे विचार ही होते हैं जो व्यक्ति का
मूक मार्गदर्शन करते हैं और उसे अपनी मंज़िल तक पहुँचाते हैं । तेज रफ्तार वाली
आजकी दुनियामें, जहाँ लोगोंको साँस लेकर सोचनेका, या विचार-जगत में डुबकी लगानेका
समय नहीं हैं, वहाँ “चिंतन” के माध्यम से जीवनमें यह अवकाश
खडा करना यह सुसंस्कृत का प्रयोजन है । “अविचारी” जीवन से “विचारी” जीवन, “सद्विचारी” जीवन, और “दिव्य विचारी” जीवन – ऐसी उत्तरोत्तर उन्नति मनुष्यत्व का गौरव-मार्ग है । “विचारशीलता”, “विचार-प्रामाणिकता”, और “विचार व्यवहार्यता” – ऐसी त्रिविध उपासना ही संस्कृति का संवर्धन कर सकती है ।
सुसंस्कृत के “चिंतन” विभाग में कुछ विषय छाँटकर
प्रस्तुत किये गये हैं, जिन पर वाचक या सदस्य वर्ग अपने विचार लेख, कहानी,
पॉवर-पॉइंट, कॉमिक या अन्य किसी भी स्वरुपमें संपादक को भेज सकते हैं । इनकी
आवश्यक समीक्षा करनेके बाद संपादक इन्हें संबंधित विषय-विभाग में प्रकट करेंगे ।
वैयक्तिक विकासमें आवश्यक है कि इन्सान मननशील और चिंतनशील रहे; अर्थात् अच्छा
होगा यदि हम सब किसी न किसी विषयको लेकर अभ्यास जारी रखें, और उन पर अपना मनोगत
सुसंस्कृत द्वारा प्रकट करें ।
यह ध्यान रहे कि “चिंतन” विभाग केवल विचार-विहार का माध्यम
नहीं है; यहाँ चूने हुए विषय, केवल “विषय” नहीं है । इनमें से कुछ विचार वे हैं जिन्होंने जगत के
इतिहासको नया मोड दिया, कुछ वे हैं जो हमारे दैनं-दिन जीवनको प्रकाशित कर सकते
हैं, और कुछ वे हैं जिन पर विचार और शीघ्र आचार खडे करना, श्रेष्ठ भविष्यके
निर्माणमें अनिवार्य है । विचारों की अभिव्यक्ति पाण्डित्य प्रदर्शन के हेतु करना
एक बात; और चिंतन-मनन द्वारा विचार-सान्निध्य, आत्म संशोधन एवं संस्कृति निर्माणमें
सहायक होना अलग बात । “चिंतन” का प्रयास है कि हम भारतीय नींवके करीब जायें, उन्हें
सूक्ष्मतासे समजें, और भावि निर्माण हेतु उन्हें योगदान देने तुल्य बनायें ।
जिन मन-बुद्धिसे
चिंतन-मनन करना है, उस अंतःकरणको ईश्वर विशुद्ध करें; बुद्धि प्रगल्भ,
तीक्ष्ण, चिकित्सक, उदार, सत्त्वानुगामी और
निरहंकारी हो; सृजनशीलता उद्युक्त हो; और विचार व्यवहार्य हो । अस्तु ।
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