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आजका सुविचार

Though no one can go back and make a brand new start, anyone can start from now and make a brand new ending.

दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि ।
एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते ॥

दयाहीन काम निष्फल है, उस में धर्म नहि । जहाँ दया न हो, वहाँ वेद भी अवेद बनते हैं ।

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बहति विषधरान् पटीरजन्मा
शिरसि मषीपटलं दधाति दीपः ।
विधुरपि भकजतेतरां कलंकम्
पिशुनजनं खलु बिभ्रति क्षितीन्द्राः ॥

चंदन झहरीले सर्पको पास रखता है
, दीया अपने मस्तक पर काजल धारण करता है, चंद्र को भी कलंक है । वैसे ही राजा दुष्ट को पास रखता है ।
 


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पूर्वे वयसि तत्कुर्याधेन वृद्धः सुखं वसेत् ।
यावज्जीवेन तत्कुर्याद्येनामुत्रसुखं वसेत् ॥

युवानी में ऐसा करना जिससे बूढापा सुख से कटे । यह जीवन ऐसे जीना जिससे परलोक (या दूसरे जन्म) में चैन मिले । 

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प्रिया न्यायया वृत्ति र्मलिनमसभंगेऽप्यसुकरम्
असन्तो नाभ्यर्थाः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः ।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महताम्
सतां केनोद्रिष्टं विषमसिधाराव्रत मिदम्

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आर्ता देवान् नमस्यन्ति तपः कुर्वन्ति रोगिणः ।
अधना दातुमिच्छन्ति वृद्धा नार्यः पतिव्रताः ॥

दुःखी लोग भगवान को नमस्कार करते हैं (करना पडता है); रोगी तप करते हैं (करना पडता है); धनहीन लोग देने की ईच्छा रखते हैं (क्यों कि ईच्छा रखने में क्या जाता है ?); और वृद्ध स्त्री पतिव्रता होती है (क्यों कि उन्हें परपुरुष आश्रय नहीं देता) !

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तृषा शुष्यत्यास्ये पिबति सलिलं स्वादु सरिभि
क्षुधार्तः सन् शालीन क्वललयति शाकादिवलितान् ।
प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति वधू
प्रतीकारं व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः ॥ 

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त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि काले
धैर्यात् कदाचिद्गतिमाप्नुयात् सः ।
यथा समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे
तां यात्रिको वाञ्छति तर्तुमेव ॥

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दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः ॥

दान से स्वर्ग प्राप्त होता है, दान से ही सुख मिलता है । इस लोक और परलोक में इन्सान दान से ही पूज्य बनता है ।

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अत्याचारो ह्यनाचारोऽत्यन्तनिन्दाऽति संस्तुतिः ।
अतिशौचमशौचं च षड्विधं मूर्ख लक्षणम् ॥

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उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम् ।
सोत्साहस्य लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम् ॥ 

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विसर्ग छापें ई-मेल

विसर्ग उच्चार  

जैसे आगे बताया गया है, विसर्ग यह अपने आप में कोई अलग वर्ण नहीं है; वह केवल स्वराश्रित है । विसर्ग का उच्चार विशिष्ट होने से उसे पूर्णतया शुद्ध लिखा नहीं जा सकता, क्यों कि विसर्ग अपने आप में हि किसी उच्चार का प्रतिक मात्र है ! किसी भाषातज्ज्ञ के द्वारा उसे प्रत्यक्ष सीख लेना ही जादा उपयुक्त होगा । 

सामान्यतः
विसर्ग के पहले हृस्व स्वर/व्यंजन हो तो उसका उच्चार त्वरित जैसा करना चाहिए; और यदि विसर्ग के पहले दीर्घ स्वर/व्यंजन हो तो विसर्ग का उच्चार त्वरित हा जैसा करना चाहिए ।

विसर्ग के पूर्व कार हो तो विसर्ग का उच्चार जैसा; हो तो हा जैसा; हो तो हो जैसा, हो तो हि जैसा... इत्यादि होता है । पर विसर्ग के पूर्व अगर कार हो तो विसर्ग का उच्चार हि जैसा होता है ।

केशवः = केशव (ह)
बालाः = बाला (हा)
भोः = भो (हो)
मतिः = मति (हि)
चक्षुः = चक्षु (हु)
देवैः = देवै (हि)
भूमेः = भूमे (हे)

पंक्ति के मध्य में विसर्ग हो तो उसका उच्चार आघात देकर जैसा करना चाहिए ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । 

विसर्ग के बाद अघोष (कठोर) व्यंजन आता हो, तो विसर्ग का उच्चार आघात देकर जैसा करना चाहिए ।
प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः । 

विसर्ग के बाद यदि , , या आए, तो विसर्ग का उच्चार अनुक्रम से , , या करना चाहिए ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ।
यज्ञशिष्टाशिन(स्)सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः । 

धनञ्जयः सर्वः = धनञ्जयस्सर्वः
श्वेतः शंखः = श्वेतश्शंखः
गंधर्वाः षट् = गंधर्वाष्षट्

सः के सामने (बाद) आने पर दोनों का सोऽ बन जाता है; और सः का विसर्ग, के सिवा अन्य वर्ण सम्मुख आने पर, लुप्त हो जाता है ।
सः अस्ति = सोऽस्ति
सः अवदत् = सोऽवदत्  

विसर्ग के पहले कार हो और उसके पश्चात् मृदु व्यञ्जन आता हो, तो वे अकार और विसर्ग मिलकर बन जाता है ।
पुत्रः गतः = पुत्रो गतः
रामः ददाति = रामो ददाति 

विसर्ग के पहले कार हो और उसके पश्चात् स्वर अथवा मृदु व्यञ्जन आता हो, तो विसर्ग का लोप हो जाता है ।
असुराः नष्टाः = असुरा नष्टाः
मनुष्याः अवदन् = मनुष्या अवदन् 

विसर्ग के पहले या कार को छोडकर अन्य स्वर आता हो, और उसके बाद स्वर अथवा मृदु व्यञ्जन आता हो, तो विसर्ग का र् बन जाता है ।
भानुः उदेति = भानुरुदेति
दैवैः दत्तम् = दैवैर्दत्तम्  

विसर्ग के पहले या कार को छोडकर अन्य स्वर आता हो, और उसके बाद कार आता हो, तो, विसर्ग के पहले आनेवाला स्वर दीर्घ हो जाता है ।
ऋषिभिः रचितम् = ऋषिभी रचितम्
भानुः राधते = भानू राधते
शस्त्रैः रक्षितम् = शस्त्रै रक्षितम्

Comments
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Mahendra  - Good to learn   |59.95.58.xxx |2009-03-02 16:06:12
Very nice to read this side. For many times I wants to learn Sanskrit but I am
found difficulties at the time of reading. And today I found how to read
Visharga. Nice to see this.
Devesh  - Very nice and concise   |70.181.59.xxx |2008-12-26 07:36:38
I lked this short and sweet expalnation. Actually I had studied Sanskrit in my
6th, 7tha nd 8th grade and am still okay at it but these rules are not to be
found easily unless I get the text books.

Thanks a lot for this

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