यदि मेरे बायॅ हाथमे पुरुषार्थ हो तो दायॅ हाथमे विजय. ।
कायः कस्य न वल्लभः ।
अपना शरीर किसको प्रिय नहीं है ?
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।
शरीर धर्म पालन का पहला साधन है ।
त्रयः उपस्तम्भाः । आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यं च सति ।
शरीररुपी मकान को धारण करनेवाले तीन स्तंभ हैं; आहार, निद्रा और ब्रह्मचर्य (गृहस्थाश्रम में सम्यक् कामभोग) ।
सर्वार्थसम्भवो देहः ।
देह् सभी अर्थ की प्राप्र्ति का साधन है ।