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आजका सुविचार

Your failures won't hurt you until you start blaming them on others.

दाने शक्तिः श्रुतौ भक्तिः गुरूपास्तिः गुणे रतिः ।
दमे मतिः दयावृत्तिः षडमी सुकृताङ्कुराः ॥


दातृत्वशक्ति, वेदों में भक्ति, गुरुसेवा, गुणों की आसक्ति, (भोग में नहि पर) इंद्रियसंयम की मति, और दयावृत्ति
इन छे बातों में सत्कार्य के अंकुर हैं ।

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द्वाविमौ पुरुषौ लोके न भूतौ न भविष्यतः ।
प्रार्थितं यश्च कुरुते यश्च नार्थयते परम् ॥

दो प्रकार के लोग होना मुश्किल है; जो दूसरों की प्रार्थना पूरी करता है, और जो दूसरे के पास मागता नहि ।

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न पुत्रात् परमो लाभो न भार्यायाः परं सुखम् ।
न धर्मात् परमं मित्रं नानृतात् पातकं परम् ॥ 

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अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभा ।
यत्रास्ते विषसंसर्गोड्मृतमपि तत्र मृत्यवे ॥

अनिष्ट में से इष्ट लाभ होता हो तो फिर भी अच्छा फ़ल नहीं मिलता
, जहाँ विषका संसर्ग हो वहाँ अमृत भी मृत्यु निपजाता है ।


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काके शौचं द्यूतकरे च सत्यम्
सर्पि क्षान्तिः स्त्रीषु कामोपशान्तिः ।
क्लीबे धैर्यं मद्यपे तत्त्वचिन्ता
राजा मित्रं केन दृष्टं श्रुतं वा ॥

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अल्पाक्षरमसंदिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् ।
अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ॥

अल्पाक्षरता, असंदिग्धता, साररुप, सामान्य सिद्धांत, निरर्थक शब्द का अभाव, और दोषरहितत्व ये छे सूत्र के लक्षण कहे गये हैं ।

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धर्मो मातेव पुष्णानि धर्मः पाति पितेव च ।
धर्मः सखेव प्रीणाति धर्मः स्निह्यति बन्धुवत् ॥

धर्म माता की तरह हमें पुष्ट करता है, पिता की तरह हमारा रक्षण करता है, मित्र की तरह खुशी देता है, और संबंधीयों की भाँति स्नेह देता है ।

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किं करोति नरः प्राज्ञः प्रेर्यमाणः स्वकर्मणा ।
प्रागेव हि मनुष्याणां बुद्धिः कर्मानुसारिणी ॥

पूर्व कर्मों से प्रेरित अज्ञानी इन्सान क्या करे ? वैसे भी इन्सान की बुद्धि कर्मानुसारिणी होती है !
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सत्यं माता पिता ज्ञानंधर्मो भ्राता दया सखा ।
शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रःषडेते मम बान्धवाः ॥

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दिग्वाससं गतव्रीडं जटिलं धूलिधूसरम् ।
पुण्याधिका हि पश्यन्ति गंगाधरमिवात्मजम् ॥

गंगा को धारण करनेवाले महादेव की भाँति दिगंबर, निर्लज्ज, जटावाले, और धूल से मैले बालक को तो कोई विशेष पुण्यशाली
जीव हि देख सकता है ! (अर्थात् ऐसा बच्चा किसे अच्छा लगेगा ?)

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राजा कालस्य कारणम् छापें ई-मेल
चिंतन - शासन संस्था

Image SuSanskrit is not about teaching or preaching. It is about learning, knowing and exploring our inner abilities, ‘The potentially Divine self’ as referred by Swami Vivekananda. It’s an effort to keep our culture alive in its true sense, to live our life in true spirit, to make sure our next generations gets the right environment to grow and prosper materially and spiritually. ‘Chintan’ section on SuSanskrit aims to do the same. It aims at challenging our routine life and our so called comfort zone, to be active and responsible about our self and environment around us, much less the world around us. We may not be writers nor have any linguistic mastery to mesmerize the reader. Thoughts reproduced here are not to impress but are to make us think about our future and how are we ready to face the challenging tomorrow.
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चिंतन छापें ई-मेल
चिंतन - सर्व-संयोजन

...स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ (श्री.गीता 17/15)
...सद्विचारों और शास्त्रीय विचारोंका आदान-प्रदान वाङ्मयीन तप है ।

Imageइन्सान अपने संग से पहचाना जाता है यह उक्ति बचपनसे ही हमारे अंतरपट पर अंकित की गयी है, और विचारों से श्रेष्ठ भला और किसका संग हो सकता है ? Image

पर अन्य कई सद्विचारों और संस्मृतियोंकी भाँति यह भी केवल सुवाक्य बन कर रह जाय, ऐसा संभव है । दैनंदिन जीवन और भौतिक विकासकी गतानुगतिक दौड ने
सच्चे जीवन की उपासना को विस्मृत सा करा दिया है ।

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आशय छापें ई-मेल
स्थायी लेख - सामान्य

॥ वृत्तेन आर्यो भवति ॥ Image
प्राणभूतञ्च यत्तत्त्वं सारभूतं तथैव च । संस्कृतौ भारतस्यास्य तन्मे यच्छतु संस्कृतम् ॥ 

संस्कृत भारत भूमि की प्राणभूत व सारभूत भाषा है; अर्थात् संस्कृत के बिना भारत की भव्य संस्कृति, नीतिमूल्यों, और जीवनमूल्यों को यथास्वरुप समजना संभव नहीं ।
 

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विसर्ग छापें ई-मेल
स्थायी लेख - उच्चारण

विसर्ग उच्चार  

जैसे आगे बताया गया है, विसर्ग यह अपने आप में कोई अलग वर्ण नहीं है; वह केवल स्वराश्रित है । विसर्ग का उच्चार विशिष्ट होने से उसे पूर्णतया शुद्ध लिखा नहीं जा सकता, क्यों कि विसर्ग अपने आप में हि किसी उच्चार का प्रतिक मात्र है ! किसी भाषातज्ज्ञ के द्वारा उसे प्रत्यक्ष सीख लेना ही जादा उपयुक्त होगा । 

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उत्तमा आत्मनः ख्याताः पितु छापें ई-मेल
सुभाषित - अन्य

उत्तमा आत्मनः ख्याताः पितुः ख्याताश्च मध्यमाः ।
अधमा मातुलात् ख्याताः श्वशुराश्चाधमाधमाः ॥

जिस की पहेचान आत्मख्याति से हो वह उत्तम, पितृख्याति से हो वह मध्यम, मातुल (मामा) की ख्याति से हो वह अधम, पर ससुर की ख्याति से हो वह अधम में अधम है ।

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