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आजका सुविचार

The height of your accomplishments will equal the depth of your convictions.

दुर्बलस्य बलं राजा बालानां रोदनं बलम् ।
बलं मूर्खस्य मौनित्वं चौराणामनृतं बलम् ॥

दुर्बलों का बल राजा है; बच्चों का बल रुदन है; मूर्खो का बल मौन है; और चोरों का बल असत्य है ।

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दीपो यथाल्पोऽपि तमांसि हन्ति
लवोऽपि रोगान् हरते सुधायाः ।
तृणं दहत्याशु कणोऽपि चाग्नेः
धर्मस्य लेशोऽप्यमलः तथां हः ॥

दिया छोटा हो तो भी अंधकार दूर करता है, अमृत की एकाध बूँद रोगों का निवारण करती है, अग्नि का तिन्का घास को जला देता है । वैसे हि लेशमात्र धर्म भी पाप को जला देता है ।

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प्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं स्मरन्तः

शिरसि निहितभाराः नारिकेलाः नराणाम् ।

ददाति जलमतल्पास्वादमाजीवितान्तं

न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति ॥

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एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं
गच्छाम्यहं पारिमिवार्णवस्य ।
तावद् द्वितीयं समुपस्थितं मे
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥

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परोपकृति कैवल्ये तोलयित्वा जनार्दनः।
गुर्वीमुपकृतिं मत्वा ह्यवतारान् दशाग्रहीत् ॥

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विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥

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अहमेव गुरुः सुदारुणानामिति हालाहल मा स्म तात दृप्यः ।
ननु सन्ति भवादृशानि भूयो भुवनेस्मिन् वचनानि दुर्जनानाम् ॥

हे हलाहल (विष) ! मैं भय़ंकर में श्रेष्ठ हूँ एसा घमंड न करना । इस जगत में तुज से भी भयंकर दुर्जन के वचन है ।

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भृगुं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुमङ्ग़िरसं तथा ।
मरीचिं दक्षमत्रिं च वसिष्ठं चैव मानसम् ॥

भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरस, मरीचि, दक्ष, अत्रि, और वसिष्ठ ये ब्रह्मा के नौ मानस पुत्र हैं ।

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वृत्यर्थं नातिचेष्टेत सा हि धात्रैव निर्मिता ।
गर्भादुत्पतिते जन्तौ मातुः प्रस्रवतः स्तनौ ॥ 

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तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गः तृणं शूरस्य जीवनम् ।
जिताक्षस्य तृणं नारी निस्पृहस्य तृणं जगत् ॥

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विश्व को क्या देंगे ? केवल हिंदुत्त्व ? छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व
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वैदिकधर्म विचार (भा. १)

मार्च का समय था । दसवीं कक्षा के इम्तेहान सर पे आ रहे थे । सतीश उसके मित्रों के साथ बडे इत्मनान से उसकी तैयारीयों में लगा हुआ था । एकाएक शहर का व्यवहार ध्वस्त हो गया । किसी कट्टर मजहबी नेता की धरपकड से दंगे फसाद सुरु हो गये थे । बच्चों का घर से आना-जाना सुरक्षित नहीं था । दोस्तों का मिलना बंद हुआ, साथ में होनेवाली पढाई भी रुक गई ।

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वैदिक संपदा, विश्व संपदा छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. २)

आज शनिचर है । कॉलेज में अंतिम दो लेक्चर्स कॅन्सल हुए, तो प्रतीक मिहिर को अपने घर खाने पर ले गया । घर पहुँचकर दोनों ने रसोई में हाथ बँटाया, क्यों कि मिहिर के आने से माँ को अपना रसोई कार्यक्रम बदलना पडा था । दोनों ने मिलकर खीर पकायी और फिर खाना खाकर दिवानघर में बातें करने बैठ गये । 
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आर्यावर्त: यथा विचार तथा आचार छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. 3)

अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥
 

जो स्वयं सभी शास्त्रों का अर्थ जानता है, दूसरों के द्वारा ऐसा आचार स्थापित हो इसलिए अहर्निश प्रयत्न करता है; और ऐसा आचार स्वयं अपने आचरण में लाता है, उन्हें आचार्य कहते है ।

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अंतःकरण शुद्धि और चारित्र्य निर्माण छापें ई-मेल
चिंतन - दार्शनिक चिंतन

Image भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है - उच्च चारित्र्य का निर्माण नचिकेता, राजा जनक, महर्षि वेदव्यास, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिळक, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेक चरित्र इस भव्य संस्कृति की अमूल्य देन है भारतीय इतिहास के हर काल हर क्षेत्र में ऐसे उच्च चरित्र का होना हमारी संस्कृति की गरिमा तथा यशस्वीता का प्रतीक है । 

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विश्व या अजूबा ! छापें ई-मेल
चिंतन - आधुनिक विज्ञान

Image “It is a terrible thing to see and have no vision”. हेलन कॅलर के इन शब्दों में चर्म चक्षु की मर्यादा व्यक्त होती है । क्या मतलब यदि आँखें हो पर दृष्टि न हो ! दृष्टि हो पर दर्शन (दृष्टिकोण और ध्येय) न हो !

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