वैदिक संपदा, विश्व संपदा मुद्रण

वैदिकधर्म विचार (भा. २)

आज शनिचर है । कॉलेज में अंतिम दो लेक्चर्स कॅन्सल हुए, तो प्रतीक मिहिर को अपने घर खाने पर ले गया । घर पहुँचकर दोनों ने रसोई में हाथ बँटाया, क्यों कि मिहिर के आने से माँ को अपना रसोई कार्यक्रम बदलना पडा था । दोनों ने मिलकर खीर पकायी और फिर खाना खाकर दिवानघर में बातें करने बैठ गये ।

काफ़ी अरसे से भारतीय क्रिकेट टीम का पर्फोर्मंस बुरा चल रहा था । दोनों के बीच इस विषय में लंबी बातें चली । बातों बातों में प्रतीकने कहा, "इस धोनी से तो अब हाथ धो लेने चाहिए; पीछ्ले दस मेचों में कभी भी दस से ज़ादा रन नहीं बनाये !"

मिहिर: नहीं यार ! आज-कल उसका शनि चल रहा है । एखाद महिने बाद देखना वह कैसे नये रॅकॉर्ड्स बनाता है !

प्रतीक: और वह युवराज को भी क्या रोग लगा है मालुम नहीं ! उससे तो हमारी गली का प्रसाद अच्छा खेल लेता होगा !

मिहिर: छोड यार ! वह पीछले सप्ताह ही शिर्डी जाकर आया है । कल की मॅच में वह जरुर सॅंचुरी बनायेगा, लिख लेना !

प्रतीक: तूं तो एकदम “वेदिया” है । हर बात को खींच-तान कर या तो शनि-राहु पर थोप देता है, या फिर सिद्धि-विनायक या शिर्डी पहुँचा देता है !

अब तक माँ ने रसोईघर की सफाई खत्म कर ली थी । वे अंदर प्रतीक-मिहिर की बातें चूपचाप सुन रही थी । वे बाहर आयी, और उन्होंने कहा, "बहुत अच्छा होता अगर मिहिर सचमुच “वेदिया” होता ! अगर वैदिक वाङगमय पढा होता, तो वह ऐसी बातें कभी नहीं करता ! ग्रहों, देवों या बाबाओं को कभी बीच में नहीं लाता ! “वेद” तो अति तेजस्वी विचारवाले हैं । इन्सान को आत्मश्रद्धा, कर्तव्यपालन और ब्रह्मउपासना समजाने वाले हैं ।"

प्रतीक: माँ, पर ये “वेद” क्या है ? क्या वह “गीता” या “बाइबल” की तरह कोई एक किताब है ?

माँ: अं ह (नहीं) । वेद और वैदिक वाङगमय ये तो प्राचीन ऋषियों की अति विस्तृत संपदा है । उन्होंने दिव्य तप और अथाग परिश्रम से इन्सान का जीवन सर्वाँगी, भव्य और दिव्य बनें ऐसा वाङगमय इस धरातल को दिया । उस वाङगमय के विस्तार और सर्वांगीता की सिर्फ कल्पना करोगे तो भी आद्य ऋषियों के लिए नत मस्तक हो जाओगे ।

मिहिर: Aunty, क्या आप हमें इस वाङगमय का सामान्य परिचय करा सकती हैं ?

माँ: जरुर करा सकती हूँ अगर तुम क्रिकेट, शनि और शिर्डी को थोडी छूट्टी देना चाहो तो !

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