विश्व को क्या देंगे ? केवल हिंदुत्त्व ? मुद्रण

वैदिकधर्म विचार (भा. १)


मार्च का समय था । दसवीं कक्षा के इम्तेहान सर पे आ रहे थे । सतीश उसके मित्रों के साथ बडे इत्मनान से उसकी तैयारीयों में लगा हुआ था । एकाएक शहर का व्यवहार ध्वस्त हो गया । किसी कट्टर मजहबी नेता की धरपकड से दंगे फसाद सुरु हो गये थे । बच्चों का घर से आना-जाना सुरक्षित नहीं था । दोस्तों का मिलना बंद हुआ, साथ में होनेवाली पढाई भी रुक गई ।

दिन-प्रतिदिन होनेवाले इन दंगों से सतीश तंग आ चूका था । समाज और देश के सामने इतनी समास्याएँ खडी थी, तब सभी मजहब उन्हें सुल्झाने के बजाये ज़ादा उल्झाये जा रहे थे, ऐसा उसे लगता था । रशिया की आर्थिक क्रांति पढने पर उसे लगा, "कार्ल मार्क्स सही थे, Religion is an opium (अफीन) of masses". इस बार तो उसने पिताजी को पूछ ही लिया, "पापा, लोग मजहब के नाम पे झघडते क्यों है ? एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न क्यों करते हैं ? क्या फर्क पडता है अगर मैं सतीश हूँ, सुलेमान या सोलोमन ? मेरे दोस्त चर्च या दर्गाह जाते हैं और हम मंदिर; वे हज जाते हैं और हम तीरथ ! हम सभी दोस्त जैसे एक स्कुल में पढते हैं, आप सभी जैसे एक ही दफतर में काम करते हैं, वैसे क्या हम सभी एक ही जगह पर प्रार्थना नहीं कर सकते ?"

सतीश के पिताजी सोच में पड गये । उन्होंने कभी इस बारे में सोचा नहीं था । सतीश का प्रश्न जायस था । धर्मों के बीच खडी दिवार बेबूनियाद लगती है । पर क्या धर्मों का विलयन शक्य है ? जहाँ इसाई या इस्लाम एक धर्म के तौर पर खडे हुए, वहाँ भी तो कित–कितने उप-संप्रदाय उभर आये ? ये प्रश्न केवल सतीश या उसके पिताजी का नहीं है; हम सबको भी कभी न कभी वह उपस्थित हो ही जायेगा । वैसे “रोटी” की दौड इतनी लंबी और कठिन हो गयी है कि कमाई और सस्ते मनोरंजन से अतिरिक्त सोचना, सुनना या पढना ये Luxury बनती जा रही है ! कम लोगों के पास होना इसी को क्या हम Luxury नहीं कहते ?!

“धर्म” सनातन है, अर्थात् जो प्रवाहशील है वही शाश्वत हो सकता है । किंतु, दुर्भाग्य से हम “संप्रदाय” को “धर्म” समज लेते हैं और अपरिवर्तनशील को “सनातनी” ! विविध धर्मों के निहीत तत्त्वों को अगर नहीं समजेंगे, तो विश्व में रही विविध मानसिकताओं और सभ्यताओं को न समज पायेंगे, न अपना बना पायेंगे । अर्थात् “वसुधैव कुटुम्बकम्” की वैदिक भावना अधिक अरसे तक सूत्रों में और वक्तव्यों में बंधी रहेगी !

सुसंस्कृत पर “वैदिक धर्म” विषयक श्रेणी के जरीये हम विश्व के सबसे पुरातन और फिर भी ताज़गीपूर्ण, ग्रहणशील, तत्त्वशील और बहुरंगी ऐसे आर्यविचार द्वारा “धर्म” को समजने का प्रयत्न करेंगे । Presentation के पहले भाग में जगत के प्रचलित धर्म, धर्म विषयक प्रचलित समज, और वैदिक धर्म के मुख्य अंगों का सारांश प्रस्तुत किया गया है । आगे के भागों में इन्हीं अंगों को सविस्तर प्रस्तुत किया गया है । इन विशेषताओं और सिद्धांतों को समजे बगैर केवल “हिंदुत्त्व” (संप्रदाय) स्थिर हो सकता है, वैदिक धर्म नहीं ।

प्रामाण्यबुद्धिर्वेदेषु साधनानामनेकता ।
उपास्यानामनियमः एतद् धर्मस्य लक्षणम् ॥

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