वैदिक काल में बालकों को शिक्षा की दीक्षा दी जाती थी । तप:स्वाध्याय निरत ऋषि, समाज में यज्ञ, एवं तपोवन में शिक्षण - ऐसे द्विविध रुप से सांस्कृतिक संवर्धन में व्यस्त रहते थे । जैसे एक भी ऋषि अविवाहित नहीं जान पडते, वैसे ही एक भी ऋषि तपोवन या अाश्रम से न जुडे हुए हो - ऐसा भी दिखायी नहीं पडता । समाज के धर्म और नीति-मूल्य रक्षण में व्यस्त ऋषि, राजा और शिक्षण - इन दोनों की ओर विशेष लक्ष्य दिया करते थे; क्यों कि यज्ञ की यथार्थता और समाज का नैतिक अारोग्य, राजा और शिक्षण - इन दोनों पर विशेष अवलंबित होता है । यज्ञ द्वारा समाज और शिक्षण द्वारा भावि व्यक्ति, विशेष रुप से पुष्ट होते थे । संस्कृति और अध्यात्म की अन्योन्यता चरितार्थ होती थी ।
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“If I were asked under what sky the human mind has most fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions to some of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant, I should point to India.”
– Friedrich Max Muller
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“नाम में क्या रखा है !” यह वाक्य कीर्तिविषयक हो तब तो ठीक है, पर वैयक्तिक नामाभिधान के अनुसंधान में अगर हो, तो उसे ज्यादा अर्थ नहीं, क्यों कि नाम तो potential energy जितना शक्तिशाली होता है । पर विशेष विचार किये बगैर यह बात सहसा ध्यान में नहीं अाती ।
अाज के Digital Age में इन्सान की identity एक से अनेक होती जा रही है । जन्म के साथ मिले हुए नाम से शुरू होनेवाली identity, credit cards या smart cards की digital identity में, अथवा वेब साइट्स के usernames में उलज जाती है । बचपन में खिलौनों से खेलनेवाला बालक, बडा होने के बाद भी केवल खेलते ही रहता है; यह है कि उसके खिलौने थोडे sophisticated हो जाते हैं जिन्हें हम gadgets (इलेक्ट्रीक उपकरण) कहते हैं ।
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(....भाग १ से चालु) इन प्रश्नोंके उत्तर खोजने के लिए "स्मृति" की सांस्कृितक औरअाध्यात्मिक भूमिका के बारेमें सोचना अावश्यक है, क्योंकि विज्ञान, वाणिज्यऔर प्रचलित धर्म - इनसभी ने यह काम बडी चतुराई से सामान्य मानव के कंधों पर डालदिया है ।
अंतःकरणमें स्मृति का स्थानः
भारतीय दर्शन और संस्कृति मे स्मृति का स्थान विशेष है ।
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गांधीजी के सिद्धांत और उनकी व्यवहार्यता बहुधा चर्चास्पद रहे हैं, किंतु उनका जीवन प्रामाणिक इन्सान को निश्चित ही प्रेरणादायी लगा है । कभी कभी तो जीवन से भी उनकी मृत्यु ज़ादा प्रभावी लगती है ! किसी भी प्रकार की पूर्वसूचना दिये बगैर इतना सहसा मृत्यु अा मिला, फिर भी संपूर्ण सज्ज; मुख से निकला "हे राम" ! ये कोई अकस्मात वाचक शब्द नहीं थे, बल्कि उपासना वाचक शब्द थे; अंतिम क्षण में उन्हें "ईश्वर" का स्मरण हुअा और येशु की तरह क्षमा धर्म का । राष्ट्र के एवं अन्य कई सेवा-कार्यों में अात्यंतिक व्यस्त होने के बावजुद उन किसी बातों का नहीं, बल्कि ईश्वर का स्मरण होना यह कोई सामान्य घटना नहीं है । "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्" (८/५) इस गीता वचन की पुष्टी ही यहाँ दिखाई पडती है ।
अर्थात् मृत्यु के प्रति ऐसे प्रतिभाव का कारण था; अाजीवन की हुई "स्मृति" की अाराधना ।
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