आर्यावर्त: यथा विचार तथा आचार मुद्रण

वैदिकधर्म विचार (भा. 3)

अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥

जो स्वयं सभी शास्त्रों का अर्थ जानता है, दूसरों के द्वारा ऐसा आचार स्थापित हो इसलिए अहर्निश प्रयत्न करता है; और ऐसा आचार स्वयं अपने आचरण में लाता है, उन्हें आचार्य कहते है ।


आचार्य की इतनी सुंदर व्याख्या, शायद ही किसी और भाषा में हो ! क्या वैदिक विचार और प्राचीन भारत, मानवजीवन के मूलभूत मूल्यों का आचार्य बन सकता है ?

वैदिकों के इतिहास ग्रंथों के ज़रीये, अगर पुरातन भारत की ओर दृष्टिपात करें तो आर्यावर्त वैदिक विचारों का प्रतिबिंब था, ऐसा लगे बिना नहीं रहता । दैवी-आसुरी विचारधाराओं का संघर्ष यद्यपि तब भी उतना ही प्रवर्तमान दिखाई देता है, जितना की आज है ! परंतु, सामान्यतः व्यक्ति जीवन और सामाजिक जीवन में गहन तात्त्विक सिद्धांतों का परावर्तन स्पष्ट देखाई पडता है ।


तकनीकी विकास का स्तर हर युग में या हर समाज में अलग अलग हो सकता है, पर केवल तकनीकी विकास से मनुष्यत्व का स्तर निश्चित नहीं होता ।
“(Economic) Development does not tentamount to Welfare” यह तो अर्थशास्त्री भी कुबुल करते हैं । क्या तटस्थ बुद्धि से आर्यावर्त Welfare state की कसौटी में पार उतर सकता है ? इस Presentation में प्रस्तुत की गयी वैदिक धर्म की विशेषताएँ इस उपक्रम में उपयुक्त हो सकती हैं । पर खयाल रहे कि अब धर्म की व्याख्या संप्रदाय के संकुचित अर्थ में नहीं ली गयी, बल्कि समस्त मानवी जीवन को आकार देनेवाले पुरुषार्थ के रुप में प्रयुक्त हुई है ।


वैदिक भारत विश्व का आचार्य बने न बने, पर हम अर्वाचीन भारतवासी, उसके नम्र और प्रामाणिक विद्यार्थी बनें, तो वह भी कोई छोटी सिद्धि न होगी !
 

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