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(....भाग १ से चालु) इन प्रश्नोंके उत्तर खोजने के लिए "स्मृति" की सांस्कृितक औरअाध्यात्मिक भूमिका के बारेमें सोचना अावश्यक है, क्योंकि विज्ञान, वाणिज्यऔर प्रचलित धर्म - इनसभी ने यह काम बडी चतुराई से सामान्य मानव के कंधों पर डालदिया है ।
अंतःकरणमें स्मृति का स्थानः
भारतीय दर्शन और संस्कृति मे स्मृति का स्थान विशेष है ।
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स्मृति का स्थान समजने के लिए अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के विविध अंगों को समज लेना चाहिए ।
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अंतर्विश्व: अहंकार – अलगता का अहेसास बुद्धि – संकल्पात्मिका – thesis, antithesis, synthesis, तर्क-कुतर्क मन – विकल्पात्मक, भावसंपुट चित्त – संस्कार क्षेत्र
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बहिर्विश्व बहिष्करण: ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ, पँचतन्मात्राएँ, सभी विषय, ज्ञेय, उपास्य, साधन, समाज, प्रकृति इ.
- अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के बीच निरंतर लेन-देन होती रहती है ।
- अंतर्विश्व के कार्य: Receipt Function और Respond Function
- अंतर्सृष्टि: तर्क, कुतर्क, चिकित्सा, कौतुहल, अन्वेषण, विश्लेषण, संश्लेषण, विकल्प, संकल्प, संवेदना, भावार्द्रता, और अनेक प्रकार के भावों से एकरुपता - जैसे रुद्रता, भीरुता, वात्सल्य, पलायनता, वीरता, मोहितता, व्यग्रता इत्यादि ।
- मन स्मृतिसंपुट और भावसंपुट है, तथा चित्त संस्कार संपुट ।
- चित्त रुपी संस्कार क्षेत्र में बाह्य एवं अांतरिक सभी गतिविधीयों का - बुद्धि, स्मृति, भाव-भावनाएँ अादि का परिणाम निरंतर होता रहता है । ...स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् । (यो.सू.)
आंतरिक विकास में स्मृति की भूमिका
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सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में स्मृति Catalyst (सहायक) जैसी है ।
- इसी लिए गीता में भगवान ने स्मृति को विभूति बतलायी है;
- कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा (श्री.गीता १०-३४)
- नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा...."स्मृतिलोप" अर्जुनविषाद का एक प्रमुख कारण है ।
- श्रवण और चिंतन का क्या अर्थ यदि वे स्मृति में दृढ न होते हों ?!
- श्रद्धवीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् । (यो.सू.) - स्मृति "योग" का साधन है । सीधे ध्यान की मुद्रा में बैठने से योग नहीं हो जाता । स्मृतिपरिशुद्धौ...(यो.सू.) - स्मृति की शुद्धि अावश्यक है ।
- बुद्धि से भी स्मृति जादा बलवान है – क्यों कि "सस्कार" के अतिरिक्त, कृति की अंतिम उद्दीपक स्मृति है ।
- जैसे कि "ईश्वरप्रेम" – इसकी केवल समज पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी निरंतर स्मृति रहे वह आवश्यक है ।
- इसी लिए वेदांत ने श्रवण, मनन, निदिध्यासन की साधन-त्रयी बतलायी; क्यों कि मनन और निदिध्यासन के बिना "श्रवण" की या अध्ययन की गहराई नहीं बढती ।
- दूसरों की गलतीयाँ और दोषों का हमें सहज स्मरण हो जाता है, जैसे कि बोलीवुड के गानें या महत्त्वाकांक्षा शायद ही कभी हमारे दिमाग से ओझल होते हैं !
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भारतीय दर्शन कहता है; महत्त्वाकांक्षा की नहीं, ध्येय की स्मृति रहनी चाहिए
- ईश्वर विषयक स्मृति; उसका अस्तित्व, कृपा, प्रेम, संबंध और दिये हुए वचन की स्मृति
- आत्मस्वरुप की स्मृति रहनी चाहिए ।
- चित्तएकाग्रता करना याने क्या करना ? स्मृति याने Retention | सत्य की, ईश्वर की धारणा करना याने “एकाग्र होना” ।
- ईश्वर ने की हुई मदत, उनके गुण, संबंध और स्वरुप का अचल स्मरण याने "ध्यान" ।
- यदि स्मृति ही विकसित न हो, तो अांतरिक – अात्मिक उपासना कैसे शक्य हो सकती है ?
- इस लिए अंतःकरण के अन्य पहेलुओं के साथ साथ स्मृति को भी सुयोग्य आकार देना होगा ।
- जीवनविकास याने Object से Subject की ओर प्रवास, और Subject को व्यापक करनेका प्रयास ।
- स्मृतिशुद्धि, अंतःकरणशुद्धि का मुख्य हिस्सा है ।
- अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । या अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । ऐसे अनेकविध वचनों के द्वारा गीताकार ने स्मृति-महिमा की ओर निर्देश किया है ।
शिक्षण में “स्मृति” विषयक सांप्रत प्रवाह
इसी रफ्तार से यदि चलते रहें, तो स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥गी. २-६३॥ ऐसी स्थिति दूर नहीं । रहे - सहे सांस्कृतिक मूल्य भी भारतीय जीवन-प्रणालि से अगली पीढी तक लुप्त हो जायेंगे ।
ऋषियों ने मानवी विकास में स्मृति का महत्त्व पहचाना था; और इसी लिए स्मृति विकास को दैनं-दिन जीवन में समाविष्ट कर लिया था ।
स्मृति परत्व भारतीय संस्कृति
विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया । यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥
जिसमें विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता और क्रियाशीलता - ये छे गुण है, उसके लिए असाध्य कुछ भी नहीं है । मानवी जीवन को गौरव प्रदान करनेवाले इन गुणों में "स्मृति" को शास्त्रकारों ने स्थान दिया, और उसे विकासात्मक मोड देने का प्रयत्न किया ।
जीवन विकास में स्मृति का योगदान इतना महत्त्वपूर्ण है कि वैदिकों ने शास्त्रों के एक अंग को ही “स्मृति” कहा – नीति और कृति को सीधा स्पर्श करनेवाली; जिसकी विस्मृति होने से मानवी जीवन और सामाजिक जीवन ध्वस्त होता है, वे "स्मृति" ग्रंथ ।
वैदिकों को क्या अब भी केवल कर्मकांडी कहेकर छोड देना ठीक होगा ?
अर्जुन जैसी आत्म-स्मृति कब हो क्या मालुम ! पर प्रामाणिक प्रयत्न करने पर, मन की स्मृति रुप विशिष्ट क्षमता का अाकार-लाभ जरुर हो सकता है; नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा...
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