स्मृति: जरा मेरा भी स्मरण कर लो (२) मुद्रण ई-मेल
(....भाग १ से चालु)
इन प्रश्नोंके उत्तर खोजने के लिए "स्मृति" की सांस्कृितक औरअाध्यात्मिक भूमिका के बारेमें सोचना अावश्यक है, क्योंकि विज्ञान, वाणिज्यऔर प्रचलित धर्म - इनसभी ने यह काम बडी चतुराई से सामान्य मानव के कंधों पर डालदिया है ।

अंतःकरणमें स्मृति का स्थानः

भारतीय दर्शन और संस्कृति मे स्मृति का स्थान विशेष है ।

  • स्मृति का स्थान समजने के लिए अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के विविध अंगों को समज लेना चाहिए ।

  • अंतर्विश्व:
    अहंकार – अलगता का अहेसास
    बुद्धि – संकल्पात्मिका – thesis, antithesis, synthesis, तर्क-कुतर्क
    मन – विकल्पात्मक, भावसंपुट
    चित्त – संस्कार क्षेत्र
  • बहिर्विश्व
    बहिष्करण: ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ, पँचतन्मात्राएँ, सभी विषय, ज्ञेय, उपास्य, साधन, समाज, प्रकृति इ.
  • अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के बीच निरंतर लेन-देन होती रहती है ।
  • अंतर्विश्व के कार्य: Receipt Function और Respond Function
  • अंतर्सृष्टि: तर्क, कुतर्क, चिकित्सा, कौतुहल, अन्वेषण, विश्लेषण, संश्लेषण, विकल्प, संकल्प, संवेदना, भावार्द्रता, और अनेक प्रकार के भावों से एकरुपता - जैसे रुद्रता, भीरुता, वात्सल्य, पलायनता, वीरता, मोहितता, व्यग्रता इत्यादि ।
  • मन स्मृतिसंपुट और भावसंपुट है, तथा चित्त संस्कार संपुट ।
  • चित्त रुपी संस्कार क्षेत्र में बाह्य एवं अांतरिक सभी गतिविधीयों का - बुद्धि, स्मृति, भाव-भावनाएँ अादि का परिणाम निरंतर होता रहता है । ...स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् । (यो.सू.)
  • स्मृति: आंतरिक विश्व और बाह्य विश्व के बीच सेतु समान है ।

  • लेन-देन की प्रक्रिया मे बेंक की तरह “संभालने” का काम स्मृति करती है ।
  • अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृति: । (यो.सू.)
  • स्मृति में वस्तु, व्यक्ति, Inferences, Information, अनुभव – सभी कुछ register हो जाता है, और कृति या व्यवहार में इन सबका प्रतिबिंब दिखायी पडता है ।
  • संबंधों में भी पूर्वग्रहों का प्रतिबिंब व्यक्त होता है, जो स्मृति में अंकित रहते हैं ।
  • अपने आप की Personality और Character विषयक Impressions भी जीवनभर स्मृतिपट पर रहती है ।

आंतरिक विकास में स्मृति की भूमिका

  • सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में स्मृति Catalyst (सहायक) जैसी है ।

  • इसी लिए गीता में भगवान ने स्मृति को विभूति बतलायी है;
  • कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा (श्री.गीता १०-३४)
  • नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा...."स्मृतिलोप" अर्जुनविषाद का एक प्रमुख कारण है ।
  • श्रवण और चिंतन का क्या अर्थ यदि वे स्मृति में दृढ न होते हों ?!
  • श्रद्धवीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् । (यो.सू.) - स्मृति "योग" का साधन है । सीधे ध्यान की मुद्रा में बैठने से योग नहीं हो जाता । स्मृतिपरिशुद्धौ...(यो.सू.) - स्मृति की शुद्धि अावश्यक है ।
  • बुद्धि से भी स्मृति जादा बलवान है – क्यों कि "सस्कार" के अतिरिक्त, कृति की अंतिम उद्दीपक स्मृति है ।
  • जैसे कि "ईश्वरप्रेम" – इसकी केवल समज पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी निरंतर स्मृति रहे वह आवश्यक है ।
  • इसी लिए वेदांत ने श्रवण, मनन, निदिध्यासन की साधन-त्रयी बतलायी; क्यों कि मनन और निदिध्यासन के बिना "श्रवण" की या अध्ययन की गहराई नहीं बढती ।
  • दूसरों की गलतीयाँ और दोषों का हमें सहज स्मरण हो जाता है, जैसे कि बोलीवुड के गानें या महत्त्वाकांक्षा शायद ही कभी हमारे दिमाग से ओझल होते हैं ! 
  • भारतीय दर्शन कहता है; महत्त्वाकांक्षा की नहीं, ध्येय की स्मृति रहनी चाहिए

  • ईश्वर विषयक स्मृति; उसका अस्तित्व, कृपा, प्रेम, संबंध और दिये हुए वचन की स्मृति
  • आत्मस्वरुप की स्मृति रहनी चाहिए ।

  • चित्तएकाग्रता करना याने क्या करना ? स्मृति याने Retention | सत्य की, ईश्वर की धारणा करना याने “एकाग्र होना” ।
  • ईश्वर ने की हुई मदत, उनके गुण, संबंध और स्वरुप का अचल स्मरण याने "ध्यान" ।
  • यदि स्मृति ही विकसित न हो, तो अांतरिक – अात्मिक उपासना कैसे शक्य हो सकती है ?
  • इस लिए अंतःकरण के अन्य पहेलुओं के साथ साथ स्मृति को भी सुयोग्य आकार देना होगा ।
  • जीवनविकास याने Object से Subject की ओर प्रवास, और Subject को व्यापक करनेका प्रयास ।
  • स्मृतिशुद्धि, अंतःकरणशुद्धि का मुख्य हिस्सा है ।
  • अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् । या अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः । ऐसे अनेकविध वचनों के द्वारा गीताकार ने स्मृति-महिमा की ओर निर्देश किया है ।

शिक्षण में “स्मृति” विषयक सांप्रत प्रवाह

  • क्षणिक स्मरण-शक्ति की बोलबोला – रट्टा मारो, गुणांक पाओ

  • स्पर्धात्मक स्मरण-शक्ति – GK में Master, तो लगोगे Smarter, और बढोगे Faster
  • “Change is the ONLY Constant” – बदल और उसकी तेज रफ्तार - दीर्घ स्मृति रखकर क्या मतलब ?
  • तकनीकी विकासः External Memory और Artifical Intelligence
  • Information Age में छोटी सी chip पर कितना कुछ store किया जा सकता है, तो स्मृति को कष्ट देकर क्या फायदा ?
  • माहिती प्रधानता – धर्म और नीति विषयोंमें भी माहिती केन्द्रितता

  • इतर प्रवृत्ति – अंधा अनुकरण, अनेकानेक प्रवृत्तियों में व्यस्त रखने की वृत्ति; स्मृति उपासना के लिए समय ही नहीं
  • चरित्र निर्माण और आत्मिक विकास – स्पर्धात्मक स्मृति का इनसे कोई वास्ता नहीं
  • बुद्धि प्रधानता – व्यावहारिक और व्यावसायिक बुद्धि पर ही सब लक्ष्य; शुद्ध बुद्धि के लिए भी न्यून अवकाश
  • मानसिक विकास – भाववृद्धि, भावसंतुलन और स्मृतिशुद्धि की ओर दुर्लक्ष
  • जब कि भाव का शुद्धिकरण गीता ने तप कहा है; भावसंशुद्घिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते (श्री. गीता १७-१६)

इसी रफ्तार से यदि चलते रहें, तो स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥गी. २-६३॥ ऐसी स्थिति दूर नहीं । रहे - सहे सांस्कृतिक मूल्य भी भारतीय जीवन-प्रणालि से अगली पीढी तक लुप्त हो जायेंगे ।

ऋषियों ने मानवी विकास में स्मृति का महत्त्व पहचाना था; और इसी लिए स्मृति विकास को दैनं-दिन जीवन में समाविष्ट कर लिया था ।

स्मृति परत्व भारतीय संस्कृति

विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिः तत्परता क्रिया ।
यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते ॥

जिसमें विद्या, वितर्क, विज्ञान, स्मृति, तत्परता और क्रियाशीलता - ये छे गुण है, उसके लिए असाध्य कुछ भी नहीं है । मानवी जीवन को गौरव प्रदान करनेवाले इन गुणों में "स्मृति" को शास्त्रकारों ने स्थान दिया, और उसे विकासात्मक मोड देने का प्रयत्न किया ।

  • मौखिक परंपरा
    वेद की शाखएँ और वैदिक वाङ्ग्मय सहस्र वर्षों तक मौखिक परंपरा से टीकाये

  • स्मरण में सरलता रहे इस लिए जादातर वाङ्ग्मय पद्यमय
    संगीत और ज्ञान का इतना अनन्य संयोग हुआ कि “छंद” ग्रंथों को वेदांग में स्थन मिला ।
    वेदाभ्यासार्थ छंदों का अभ्यास अनिवार्य है ।
  • श्लोक, सूत्र, मंत्र इत्यादि कंठस्थ करने का आग्रह

  • दिन में कु्छ न्यूनतम पारायण या जप का आग्रह
    तज्जपस्तदर्थभावनम् । (योगसूत्र)
    यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि (श्री.गीता १०)
  • अष्टांग योग में यम, नियम...इत्यादि बतलाकर ध्यान से पहले, “धारणा” की पगथी
  • नियत रुप से श्रवण, मनन, प्रार्थना और अभ्यास (पुनरावर्तन) का महत्त्व
  • ईश्वर, ऋषि, सद्चरित्रों, सद्विचारों और तीर्थों का “स्मरण”
  • श्राद्ध और पितृतर्पण द्वारा कुटुंब के श्रेष्ठ चरित्रों और मूल्यों को याद करना
  • साधन परायण नहीं, पर सत्त्व परायण शिक्षण
  • स्मृति विकास को अात्मनिष्ठ विकास का उपांग बनाया; अत्यधिक gadgets का उपयोग वस्तुनिष्ठा का द्योतक है
  • पंच महायज्ञों के अनुष्ठान का आग्रह – यज्ञ याने होम-हवन नहीं, पर यज्ञ याने निःस्वार्थ संबंध और ईश्वर प्रीत्यर्थ कृति । स्मृति और कृति को इतनी बेहतरी से जोड दिया । 

जीवन विकास में स्मृति का योगदान इतना महत्त्वपूर्ण है कि वैदिकों ने शास्त्रों के एक अंग को ही “स्मृति” कहा – नीति और कृति को सीधा स्पर्श करनेवाली; जिसकी विस्मृति होने से मानवी जीवन और सामाजिक जीवन ध्वस्त होता है, वे "स्मृति" ग्रंथ ।

वैदिकों को क्या अब भी केवल कर्मकांडी कहेकर छोड देना ठीक होगा ?

अर्जुन जैसी आत्म-स्मृति कब हो क्या मालुम ! पर प्रामाणिक प्रयत्न करने पर, मन की स्मृति रुप विशिष्ट क्षमता का अाकार-लाभ जरुर हो सकता है; नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा...


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