अंतःकरण शुद्धि और चारित्र्य निर्माण मुद्रण

भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है - उच्च चारित्र्य का निर्माण । नचिकेता, राजा जनक, महर्षि वेदव्यास, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिळक, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेक चरित्र इस भव्य संस्कृति की अमूल्य देन है । भारतीय इतिहास के हर काल व हर क्षेत्र में ऐसे उच्च चरित्र का होना हमारी संस्कृति की गरिमा तथा यशस्वीता का प्रतीक है ।


व्यक्ति के चारित्र्य निर्माण के लिए इस संस्कृति में ऐसी कौन सी बातें हैं जो आधारभूत बनती है ? हम सामान्यतः चारित्र्य को व्यक्ति के बाह्य व्यक्तित्व या personality के साथ जोडते हैं, जिसमें उसकी बुद्धि एवं बाह्य आचरण को ही महत्त्व दिया जाता है । लेकिन अगर हम सोचें तो इन सभी महान चरित्रों में कुछ ऐसे विशेष गुण व संस्कार समान रूप से दिखते हैं - जैसे कि उच्च ध्येयनिष्ठा, तेजस्वी बुद्धिनिष्ठा, भावपूर्ण हृदय, शुद्ध हेतु तथा स्वार्थ रहितता, जो एक उन्नत मानसिक अवस्था का दर्शन कराते हैं । सचमुच इस प्रकार का मानसिक विकास उच्च चारित्र्य निर्माण के लिए आवश्यक घटक है, जो कि हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

हमारी मानसिक अवस्था के लिए कई कारण जिम्मेदार है । पाश्चात्य मनोविज्ञान (फ्रोइड, युंग, इ.) में मन का गहरा विश्लेषण करके मन के अलग भाग बताए हैं, जैसे जागृत / ज्ञेय मन (conscious mind) और सुषुप्त मन (unconscious mind) । इस अज्ञेय मन में रही हुई वासनाओं का रित्र्य पर बहुत महत्वपूर्ण परिणाम होता है । वैदिक दर्शनों (वेदान्त, योग, इ.) ने भी इसका गहरा अभ्यास किया है । उनके अनुसार हमारी आंतरिक अवस्था के लिये सिर्फ मन या बुद्धि ही नहीं बल्कि संपूर्ण अंतःकरण जिम्मेदार है, जिसमें क्रियाशील मन और बुद्धि के अलावा चित्त और अहंकार का भी समावेश होता है । श्रीमद् आद्य शंकराचार्यजी ने विवेकचुड़ामणी ग्रंथ में इसकी सुंदर व्याख्या की है ।

निगद्यतेन्तःकरणं मनोधीः
अहंकृतिश्चित्तमिति स्ववृत्तिभिः
मनस्तु संकल्पविकल्पनादिभिः
बुद्धिः पदार्थाध्यवसायधर्मतः ९३

अत्राभिमानादहमित्यहंकृतिः
स्वार्थानुसंधानगुणेन
चित्तम् ९४

यहाँ पर अंतःकरण के हर घटक का अलग अलग कार्य बताया गया है । हमारा मन अनेक संकल्प तथा विकल्प करता है; बुद्धि इन संकल्प-विकल्पों पर निर्णय लेती है तथा उन्हें दिशा प्रदान करती है; परंतु, मन और बुद्धि की इन क्रियाओं को प्रेरित करनेवाला भी एक तत्त्व है जिसे “चित्त” कहते हैं । चित्त एक storehouse की भाँति है जो हमारे इन्द्रियजन्य ज्ञान तथा अनुभवों को ग्रहण कर उनका संचय करता है । इनमें हमारे पूर्वजन्म के संस्कार भी सम्मिलित होते हैं । Neurology की भाषा में, हमारे मस्तिष्क में अलग अलग neural pathways बनते हैं जिनमें से कुछ pathways हमारे उनसे संबंधित विचारों / अनुभवों को दोहराने की वजह से ज़ादा गहरे बनते हैं, और इसकी असर हमारी सोच तथा प्रतिक्रियाओं पर होती है । इस तरह चित्त में अनेक वृत्तियाँ निर्माण होती हैं जो हमारे संकल्प, विकल्प तथा निर्णयों को प्रभावित करती हैं । इसके अलावा इन सभी के पीछे एक प्रेरक बल बताया गया है “अहंकार”, जो इन सभी क्रियाओं को आधार देता है । इस आधार यानि "मैं" के बिना अंतःकरण की विविध क्रियाएँ एक दूसरे से जुड ही नहीं सकती ।
इससे यह बात निश्चित होती है कि व्यक्ति का चारित्र्य उसके अंतःकरण में रही वृत्तिओं तथा संस्कारों का प्रतिबिंब है । हम जिस प्रकार के विचारों तथा अनुभवों को ज़ादा दोहराते हैं अथवा जिस प्रकार का चिंतन ज़ादा करते हैं उस प्रकार के हमारे संस्कार बनते हैं, व उस स्तर का हमारा मानसिक विकास होता है । यहीं पर भारतीय संस्कृति की विशेषता दिखाई देती है । हमारी संस्कृति की रोजबरोज की सामान्य व्यावहारिक बातें भी ऐसी हैं जिनमें व्यक्ति का ज़ादा से ज़ादा संपर्क सात्विक विचारों से या जीवन मूलक् विचारों से किया गया है; चाहे वे बच्चों की नीति भरी कहानियाँ हो, जीवन को सुशोभित करनेवाले सरल सुभाषित रत्न हो, अनेक सांस्कृतिक विधियाँ / परंपरा हो, या सामान्य व्यवहार के अलिखित नियम हो (जैसे बडों का आदर करना, विद्या का सन्मान करना, दूसरों का भला करना, शाकाहारित्व, इ.) । ये सभी बातें हमारे अनुभव तथा चिंतन में बार बार आने से दोहराती हैं और हमारे अंतःकरण पर सहज रूप से विधायक परिणाम करते रहती है ।

हमारे विविध शास्त्र भी ऐसी ही जीवनप्रणालि को पुष्ट करते हैं । जैसे कि पातंजल योग सूत्रों में चित्त की शुद्धि को आत्यंतिक महत्व दिया गया है । योग की शुरूआत यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान) से होती है जो सामान्य जीवन व्यवहार से ही संबंधित है । उसके आगे आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि द्वारा उत्तरोत्तर चित्त शुद्धि की प्रक्रिया बतायी गयी है । इसमें मूर्तिपूजा और सगुणोपासना का भी विशेष स्थान है जो इस प्रक्रिया के लिए उचित भावना तथा वातावरण निर्माण करने में सहायक बनते हैं । उच्च विचारों के श्रवण, मनन और निदिध्यासन इत्यादि बातें भी अंतःकरण की शुद्धि में ही सहायक बनती है ।

इस तरह अंतःकरण की शुद्धि द्वारा उच्च चारित्र्य निर्माण में भारतीय संस्कृति की विविध बातें सहज रूप से अति मदतरुप बनती है । किंतु आज के आधुनिक युग में हमारा जीवन बहुत यांत्रिक होते जा रहा है और हमें ऐसी सांस्कृतिक बातों के लिए न तो वक्त है और ना ही उनकी कदर ! हम हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को धीरे धीरे छोडते जा रहे हैं, जिसके कारण जीवन में और समाज में स्वार्थ-केन्द्रितता, क्लेश, अशांति तथा अस्थिरता बढ़ते दिख रहे हैं । शायद इसी वजह से हर क्षेत्र में अच्छे चरित्रों व चारित्र्यवान नेतृत्व का आज अभाव दिखाई देता है ।

आशा है कि "सुसंस्कृत" जैसे माध्यमों द्वारा हमारे जीवन में सांस्कृतिक मूल्यों की महत्ता पुनः प्रस्थापित होगी ।